धरोहर

ये जिंदगी है कौम की…

‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’ के उद्घोषक, अंग्रेजी शासन के खिलाफ गठित आज़ाद हिन्द फ़ौज के संस्थापक और सर्वोच्च कमांडर, देश को ‘जय हिन्द’ का नारा देने वाले भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने सीमित साधनों से जिस तरह ताक़तवर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मुकाबला किया, वह विश्व इतिहास की कुछ दुर्लभ घटनाओं में एक थी। आजाद हिन्द फौज को छोड़ विश्व-इतिहास में ऐसा कोई…

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दिल की सुनो दुनिया वालों!

बीसवी शताब्दी के महानतम शायरों में एक मरहूम कैफ़ी आज़मी अपने आप में एक व्यक्ति न होकर एक संस्था, एक युग थे जिनकी रचनाओं में हमारा समय और समाज अपनी तमाम खूबसूरती, दर्द और कुरूपताओं के साथ बोलता नज़र आता है। एक तरफ उन्होंने आम आदमी के दुख-दर्द को शब्दों में जीवंत कर अपने हक के लिए लड़ने का हौसला दिया तो दूसरी तरफ सौंदर्य और प्रेम की नाज़ुक संवेदनाओं…

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बदहाल मिर्ज़ापुर का किला चुनार

56 साल ईसा पूर्व उज्जैन के शासक विक्रमादित्य ने अपने बैरागी बड़े भाई भर्तृहरि के लिए यह एकांत तपस्थली बनवाई थी। इस किले में आज भी भर्तृहरि की समाधि मौजूद है। यहाँ एक गुफ़ा है जो भर्तृहरि की गुफा के नाम से मशहूर है। पहले इस किले का नाम चरणादृगढ़ था, जो कालांतर में अपभ्रंशित हो चुनार हो गया। 18 अप्रैल सन् 1924 को चुनार के किले में एक शिलालेख…

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चाह बर्बाद करेगी, हमें मालूम न था !

स्व. कुंदन लाल सहगल हिंदी ही नहीं, भारतीय सिनेमा के पहले महानायक रहे हैं जिनसे आधुनिक हिन्दी सिनेमा की यात्रा शुरू हुई थी। सिनेमा की अति नाटकीयता के उस दौर में वे पहले अभिनेता थे जिन्होंने स्वाभाविक अभिनय के नए-नए मुहाबरे गढ़े, जिसका अनुकरण उनके बाद के अभिनेताओं ने किया। बोलते सिनेमा की शुरुआत के बाद पिछली सदी के तीसरे और चौथे दशक में दिलीप कुमार और राज कपूर के…

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नये साल पर धर्मयोद्धाओं को नमन

नए वर्ष का स्वागत करने के साथ नमन उन योद्धाओं को, जिनकी कठिन तपस्या के फलस्वरूप पिछले वर्ष लगभग पाँच सौ वर्षों के बाद हमारी धर्मभूमि अयोध्या को मुस्कुराने का अवसर मिला था। मन्दिर के भव्य शिखर पर चमकते स्वर्ण कलश की आभा में खो जाने वाले श्रद्धालु सदैव भूल जाते हैं उन महान हाथों को, जिनके द्वारा नींव के पत्थर जोड़े गए थे। आज उन्ही महान हाथ वाले धर्मयोद्धाओं…

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हम बयाबां में हैं और घर में बहार आई है

भारतीय साहित्य के हज़ारों साल के इतिहास में कुछ ही लोग हैं जो अपने विद्रोही स्वर, अनुभूतियों की अतल गहराईयों और सोच की असीम ऊंचाईयों के साथ भीड़ से अलग दिखते हैं। निर्विवाद रूप से मिर्ज़ा ग़ालिब उनमें से एक हैं। मनुष्यता की तलाश, शाश्वत तृष्णा, मासूम गुस्ताखियों और विलक्षण अनुभूतियों के इस अनोखे शायर के अनुभव और सौंदर्यबोध से गुज़रना एक दुर्लभ अनुभव है। लफ़्ज़ों में अनुभूतियों की परतें…

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सैर के वास्ते थोड़ी सी जगह और सही

दिल्ली के निज़ामुद्दीन में मौज़ूद मिर्ज़ा ग़ालिब की मज़ार दिल्ली की मेरी सबसे प्रिय जगह है। वहां की बेशुमार भीड़भाड़ में जब भी अकेला महसूस करता हूं, यह मज़ार मेरा सबसे भरोसेमंद साथी होता है। यह मज़ार संगमरमर के पत्थरों का बना एक छोटा-सा घेरा नहीं, भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बड़े शायर का स्मारक है। एक ऐसा स्मारक जिसमें उस दौर की तहज़ीब और उस दौर से आगे सोचने और…

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इस भरी दुनिया में कोई भी…

खुर्शीद जहां मुम्बई 1941 में अपने बहन से मिलने गयीं थीं। उस समय उनकी उम्र मात्र 20 साल की थी। उनके जीजा उन्हें फिल्म “सिकंदर” की मुहूर्त पर ले गये थे। फिल्म के प्रोड्यूसर सोहराब मोदी की पारखी नजर को खुर्शीद जहां में अभिनय की अपार सम्भावनाएं दिखाई दीं थीं। उन्होंने ट्रायल के तौर पर खुर्शीद जहां को उस फिल्म में एक रोल दे दिया। वह रोल तक्षशिला नरेश की…

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रंगवा में भंगवा परल हो बटोहिया

लोकभाषा भोजपुरी की साहित्य-संपदा की जब चर्चा होती है तो सबसे पहले जो नाम सामने आता है, वह है स्व भिखारी ठाकुर का। वे भोजपुरी साहित्य के ऐसे शिखर हैं जिसे न उनके पहले किसी ने छुआ था और न उनके बाद कोई उसके आसपास भी पहुंच सका। भोजपुरिया जनता की जमीन, उसकी सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं, उसकी आशा-आकांक्षाओं तथा राग-विराग की जैसी समझ भिखारी ठाकुर को थी, वैसी किसी…

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काफिरिस्तान के काफिर….

काफिरिस्तान का नाम सुने हैं? पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर एक छोटा सा इलाका है यह। बड़ा ही महत्वपूर्ण क्षेत्र! जानते हैं क्यों? क्योंकि आज से सवा सौ वर्ष पूर्व तक वहाँ विश्व की सबसे प्राचीन परंपरा को मानने वाले लोग बसते थे। रुकिए! हिन्दू ही थे वे, पर हमसे थोड़े अलग थे। विशुद्ध वैदिक परम्पराओं को मानने वाले हिन्दू… सूर्य, इंद्र, वरुण आदि प्राकृतिक शक्तियों को पूजने वाले…

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