रचना क्रम में

पुअवा जे पाकेला कराही में…

मेरा बचपन गांव और हाबड़ा (पश्चिम बंगाल) में अधिकत्तर बीता है। हाबड़ा में एक जगह है बी गार्डेन, जहाँ की धरती पर हम खेले कूदे और लोटे हैं। बचपन से हीं मैं पुआ का शौकीन रहा हूँ। मैं अक्सर जिद कर पुआ बनवाता था। हमारी एक किरायेदारिन थी। उसकी बेटी का नाम मोन्हिया था। इसलिए सब उसे मोन्हिया के माई कहते थे। मोन्हिया के माई अक्सर मुझे पुआ की याद…

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टिन के बाॅक्स के साथ सफर (6)

मैं उसी ट्रक से मेरठ जाने वाली बस पकड़ी। ट्रक ड्राइवर और खलासी दोनों भले आदमी थे। दोनों ने मिलकर मेरे बाॅक्स को बस की छत पर चढ़ाया और जाते समय मुझे हाथ जोड़कर नमस्कार भी किया। मैंने भी उनके प्रति कृतज्ञता का भाव लिए उनके लिए आशीर्वचन कहे। वे मुझे छोड़कर जोशीमठ को लौट गये। बस में तिल धरने की जगह नहीं बची थी। एक सज्जन ने तपाक से…

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टिन के बाॅक्स के साथ सफर (4)

हम सुबह के पांच बजे हरिद्वार पहुँचे। बस स्टेशन पर पहाड़ी गाने बज रहे थे। कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, पर धुन बहुत अच्छी लग रही थी। पहले हमारा इरादा हरिद्वार से ऋषिकेश जाना था। ऋषिकेश में आई टी बी पी का ट्रांजिट कैम्प था, जहां हम टिन के बाॅक्स को रखकर फिर जोशीमठ की यात्रा करने वाले थे। जब हरिद्वार से ही जोशीमठ की बस मिल गयी…

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टीन के बाक्स के साथ सफर

आजकल मैं साहित्यकार प्रमोद कुमार की कहानी संग्रह “वो मेरी मोनिका” पढ़ रहा हूँ। इस वजह से मेरी फेसबुक पर सक्रियता पहले के मुकाबले काफी कम रह गयी है। इस कहानी संग्रह की एक कहानी “विदाई का बक्सा” पढ़ा, जिसमें दुल्हा दुल्हन को लेकर ट्रेन में सफर कर रहा है। विदाई का बक्सा उसी डिब्बे में थोड़ी दूरी पर रखा गया है। भीड़ कयामत की बढ़ती जा रही है। दुल्हा…

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उठु भारत हो….

जाने कितने युगों पुरानी घटना है, जब एकाएक अयोध्या की सभी वाटिकाओं के समस्त वृक्षों पर बिना ऋतु आये ही पुष्प खिलने लगे थे। कोयल कूकने लगी थी, सूर्य ने अपना तेज मद्धिम कर लिया था, सारे पक्षी गाने लगे थे, खेतों में फसलें लहलहाने लगी थीं। एकाएक नगर के समस्त पुरुषों की भुजाएं फड़कने लगी थीं। सभी स्त्रियों की आंखों में प्रेम के डोरे उभर आए थे। वनों में…

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आज ख़ुद को गुलाब करते हैं !

वसंत की आहट के साथ अभी पश्चिम से आयातित ‘वैलेंटाइन सप्ताह’ की शुरुआत हो रही है ! हमारे देश में इस सप्ताह का विरोध इस आधार पर होता रहा है कि प्रेम की यह अभिव्यक्ति हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। ऐसा तर्क प्रेम से वंचित अभागे लोग ही दे सकते हैं। जिस संस्कृति में प्रेम नहीं उसे अपसंस्कृति कहा जाना चाहिए। प्रेम का कोई मौका विदेशी ही सही, नफ़रतों…

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अगला लोसर मनाएं ल्हासा में ।

वह मुझे श्रीनगर में मिली थी । फुटपाथ पर तिब्बती सामान बेच रही थी । मैंने मजाक में पूछा – “तिब्बत कब जा रही हो ?” उसके चेहरे पर सख्त भाव आ गये थे । मुंह लाल हो गया था । उसने बात को चबाते हुए कहा था – “हम अगला लोसर ल्हासा में मनाएंगे ।” उस दिन के बाद से हमारी उसकी कई बार मुलाकात हुई , पर मैंने…

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ततैया बैरी खा गयी रे !

कल रात की सुबह मैंने सपना देखा । ततैया मेरे सपने में आई । सुबह के वक्त नींद नहीं तंद्रा होती है । इसलिए मैं जान गया कि यह सपना है । सपने में ततैया का आना अशुभ माना जाता है । सपना देखने वाले के दुर्दिन आ जाते हैं । मैंने ततैया को डपटते हुए कहा – “तुम्हें मेरे सपने में नहीं आना चाहिए । तुम अशुभ हो “।…

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कोई सूरत नजर नहीं आती ।

जब गाड़ियों का हुजुम एक साथ खड़ा हो जाता है जो हरकत करने में असमर्थ होता है या मंथर गति से रेंगता है तो इस क्रिया को जाम लगना कहा जाता है । जाम दिन प्रतिदिन लगता है । आज की तारीख में कोई भी शहर इससे अछूता नहीं है । किसी भी शहर में अब कोई ऐसी सड़क नहीं बची है जिस पर गाड़ियां फर्राटे से दौड़ सकें ।…

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प्रथमे ग्रासे मक्षिका पातः ।

चांद सी महबूबा हो …. सबका एक सपना होता था । जब मानव चांद पर पहुंचा तो उसे पता चला कि चांद तो केवल पत्थरों पहाड़ों से बना है । वहां हरियाली तो रंच मात्र भी नहीं है । उससे लाख गुना तो अच्छी हमारी पृथ्वी है , जो हरी भरी तो है । लाखों लोगों का चांद को लेकर सोचा सपना चूर चूर हो गया । बहुत शोर सुनते…

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