हिन्दी साहित्य और गधावाद

देश के घोषित और पोषित साहित्यकारों ने एक बार फिर गधे को विमर्श के केंद्र में ला दिया है। अब इसे स्वनामधन्य साहित्यकारों की बौद्धिकता समझें या गदहपन, पर विमर्श को ऊंची अट्टालिकाओं से खींच कर गधे के पांव में लाना उन्हें नमन के योग्य बनाता है। बहुत पहले हिन्दी के जनवादी शायर अदम गोंडवी ने कहा था-
जो ग़ज़ल मासूक के जलवों से वाकिफ हो गयी,
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो।

अब अदम बेचारे जनवादी शायर थे, और ग़ज़ल विशुद्ध रोमांटिक विधा, सो बेचारे चिल्लाते चिल्लाते मर गए पर ग़ज़ल खातून की जुल्फों से चल कर होठों की लिपिस्टिक तक ही रह गयी। पर आज के सत्तावादी लेखकों की पहुँच अदम की अपेक्षा बहुत ज्यादा है, सो उन्होंने विमर्श को पल भर में ही गधे के चरणों मे ला कर खड़ा कर दिया।
हिन्दी के साहित्यकारों की यही सबसे बड़ी ताकत रही है, कि वे जिसे चाहें उसे विमर्श के केंद्र में लाकर एक नया वाद चला देते हैं। जैसे प्रसाद छायावाद लाये, तो बच्चन ने हाला को केंद्र में रख कर हालावाद छेड़ दिया। इस तरह नारीवाद, दलितवाद से आगे बढ़ता हिंदी साहित्य यदि गधावाद के दौर में पहुंच गया, तो इसका भी स्वागत होना चाहिए। यह आधुनिक साहित्यकारों की बौद्धिक परिपक्वता का सबसे बड़ा सुबूत है, कि उन्होंने गधे जैसे तिरस्कृत जीव में भी अपेक्षाएं ढूंढ ली है।
सच पूछिए तो मुझे बहुत दिनों से गधावाद की आहट सुनाई दे रही थी। पिछले कुछ दशकों से जिस प्रकार पाठकों ने हिन्दी साहित्य को तिरस्कृत किया था, उसे देखते हुए मुझे उम्मीद थी कि हिन्दी साहित्य तिरस्कार में ही अपना भविष्य ढूंढेगा। फिर गधा तो तिरस्कार का सबसे बड़ा प्रतीक है, आइकन है। साहित्यकारों के लिए उसके चरणों से ज्यादा मुफीद जगह और कौन हो सकती है।
कुछ मूर्ख अभी से गधावाद का विरोध करने लगे हैं, उन्हें लगता है कि गधे के स्तर तक आना हिन्दी साहित्य का पतन है। असल मे वो खुद गधे हैं, और वे साहित्य का ‘स’ भी नहीं जानते। साहित्य सीधा सोचने का नाम नहीं, साहित्य किसी भी बात को उल्टी निगाह से देखने का नाम है। जिस गधे को दुनिया मूर्खता का पर्याय मानती आयी है, उसी के ध्वज तले खड़े होकर विमर्श करना ही सच्चे अर्थों में साहित्यकार होना है। मनुष्यों की भीड़ में गधे की बात करना ही सच्चा जनवाद है।
मुझे समझ नहीं आता कि समानता और समाजवाद के युग मे वह कौन सी सामन्तवादी मानसिकता है, जो गधे के मुख्यधारा में आने का विरोध करती है। आखिर क्यों गधे को मूर्खता का पर्याय माना जाय? आखिर क्यों उसके विकास की राह में रोड़ा अटकाया जाय? उसे भी तो आगे आने का हक है। मेरे हिसाब से गधे का मुख्यधारा में आना अबतक की सबसे बड़ी क्रांति है। गधे का ऊपर आना मनुवाद की पराजय, और बुर्जुआ पर सर्वहारा की जीत है। युगों युगों से गधे की तरह खटता गधा सबसे बड़ा सर्वहारा है। मेरे हिसाब से यह दक्षिणपंथ पर वामपंथ की विजय है। दक्षिणपंथियों की बढ़ती ताकत के बीच बामपंथ की यह जीत कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण है। इस विजय के लिए वामपंथ को सदैव हिन्दी साहित्य का ऋणी रहना चाहिए, क्योंकि जो कार्य क्रांति के सेनानियों से पिछले सौ साल में नहीं हो सका था, वह काम साहित्यकारों ने चुटकी बजाते ही कर दिया।
हिन्दी साहित्य के पाठकों को गधावाद की जनक मृणाल पांडेय और अन्य सभी गधावादी साहित्यकारों का सामूहिक सम्मान समारोह आयोजित करना चाहिए। मैं तो यहां तक चाहता हूं कि हिन्दी साहित्य अकादमी का नाम बदल कर “हिन्दी गधावादी साहित्य अकादमी” कर देना चाहिए, और इसी वर्ष से “श्रेष्ठ युवा गधावादी” और “सर्वश्रेष्ठ गधावादी” जैसे पुरस्कार बांटने शुरू कर देने चाहिए। यह गधावाद, और हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी सेवा होगी।

 

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

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(लेखक युवा साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है )

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