राजनीति तो होती रहेगी सरकार

मध्य प्रदेश के मंदसौर में अपने हक़ की आवाज़ लिए सड़कों पर उतरे किसानों पर गोली चलवाने का आधार ये था कि ये विपक्ष की चाल है। महाराष्ट्र के किसानों की मांग भी तब तक खारिज की गई, जब तक उन्होंने सरकार को बातचीत के लिए मजबूर नहीं कर दिया। हाल के सीकर आंदोलन को भी सरकार इस मुद्दे पर 12 दिनों तक नजरअंदाज करती रही कि इसका नेतृत्व दो वामपंथी नेता कर रहे हैं। तमिलनाडु के किसान अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए जंतर मंतर पर डटे रहे, पीएमओ के सामने नंगे हो गए, लेकिन प्रधानमंत्री ने उनसे मिलने तक की जहमत नहीं उठाई और इस आंदोलन को विपक्षी षड्यंत्र करार दिया गया। ऑक्सीजन की कमी से गोरखपुर में हुई बच्चों की मौत के कारणों पर वर्तमान सरकार और व्यवस्था से ज्यादा पुरानी सरकार की गलतियों का मुलम्मा चढ़ा दिया गया। यहां तक कि हाल में लगातार हो रहे ट्रेन हादसों में भी सत्ताधारी पार्टी को कई बार विपक्षी साजिश नज़र आती है। गुजरात में सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ने के कारण विस्थापन से दूर मध्य प्रदेश के उन 192 गांवों में ग्रामीणों की दुर्दशा पर सरकार इसलिए आंखें मूंदे हुए है, क्योंकि उनका नेतृत्व मेधा पाटेकर कर रही हैं। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली सत्ताधारी पार्टी के दल की उस सरकार ने अपनी अस्मिता के सवाल को लेकर सड़कों पर उतरी बेटियों की मांग को सियासत से जोड़ दिया, जिसने मनचलों से बेटियों की रक्षा के लिए एंटी रोमियो स्क्वॉयड का गठन किया था। अदनी से एक गांव में जब कोई विधायक या सांसद आता है, तो लोग अपने मुद्दों और समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतर जाते हैं, ताकि उस जनप्रतिनिधि तक बात पहुंचे, ठीक यही किया था काशी हिंदू विश्वविद्यालय की लड़कियों ने। बेटियों से जुड़ी हर समस्या को राष्ट्रीय मुद्दा बना देने वाले प्रधानमंत्री के दौरे को लेकर उन बेटियों में उम्मीद थी कि वे जब इनकी समस्या के बारे में सुनेंगे, तो जरूर उनसे मिलेंगे या इसके समाधान के लिए कोई ठोस कदम उठाएंगे, क्योंकि वे उस क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी हैं। लेकिन हुआ ठीक इसका उल्टा। भाई लोगों ने इसके पीछे भी वामपंथियों का हाथ घोषित कर दिया। मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि इन्हें ऐसा क्यों लगता है कि कांग्रेसियों या वामपंथियों द्वारा विरोध किए जाने वाले सभी मुद्दे प्रायोजित होते हैं। अगर भाजपा शासित सरकारों में कुछ गड़बड़ी होती है, तो विपक्ष का विरोध लाजिमी है। इससे पहले कांग्रेसी या समाजवादी शासन में उनकी गलतियों पर भाजपा के विरोध को तो कभी भी प्रायोजित नहीं कहा गया। विपक्ष का काम ही है राजनीति करना, और इसके कारण मुख्य मुद्दे की गंभीरता पर पर्दा डालना या उसे खारिज करना किसी भी तरह से न्यायोचित नहीं है।

निरंजन मिश्र

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(लेखक पत्रकार और स्वतन्त्र टिपण्णीकार है । )

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