अब भी याद आता है वो पंगत में बैठकर भोजन करना ।

पंगत में बैठकर भोजन करने का एक अलग सुख होता है । आप खाते जाइए । परोसने वाले आपको खिलाते जाएंगे । बेशक आप खाते खाते थक जाएंगे , पर खिलाने वाले कत्तई नहीं थकेंगे । हां , अगर आपको किसी विशेष डिश की जरूरत है और वह आपके पास नहीं आ रही है या आप शर्मो हया के चलते मांग नहीं पा रहे हों तो ऐसे में सिर्फ आपको उस विशेष डिश परोसने वाले को बुलाना है । बुलाकर अपने बगल में बैठे सज्जन को वह डिश परोसने के लिए कहना है । परोसने वाला उन सज्जन को परोस आपके पास भी सौजन्यतावश आएगा । आपसे भी मनुहार करेगा । आपको ऐसी मुद्रा अपनानी है जैसे आप उस पर एहसान कर रहे हों । नाक सिकोड़ कर कहें – चलो दे ही दो ।

पंगत में खाने वाले बहुधा भोजन वीर हुआ करते थे । खाते खाते उनका पेट शायद हीं भरता हो । पंगत उठ जाती थी , पर उनका भोजन पूरा नहीं होता । मेरे भी एक साथी थे । वे भी भोजन भट्ट थे । विजन चौबे के गवना में उनके खाने का मुजाहिरा मैंने भी देखा था । पंगत उठ गयी । वे खाते रहे । दो आदमी उन्हें खिलाते रहे । पता नहीं वे कब तक खाते रहे । हम सभी अपने अपने घरों के लिए चल पड़े थे । ऐसे हीं एक भोजन वीर मेरे मामा के यहां होते थे । रतन तूरहा । वे जाति के तूरहा थे , पर पालकी ढोते थे । जब वे खाते थे तो जम कर खाते थे । उनके साथ वाले खाकर इंतजार करते रहते कि कब उनका भोजन खत्म हो और वे पंगत से उठें । लेकिन रतन
तूरहा खाते रहते । कई बार वे परोसने वालों पर झल्ला उठते – तूई तूई का देतानी , जोई जोई दीं ( तोड़ तोड़ कर क्यों दे रहे हैं , जोड़ी जोड़ी दीजिए ) । हां , सही सोचा आपने रतन तूरहा कुछ कुछ तुतलाते थे ।

पंगत में खाने से भोजन जाया नहीं होता । आपको जितना मर्जी हो , खाते जाइए । पर आपको परोसने वाले के मान दण्ड से हीं भोजन मिलेगा । आप मांगते जाइए , खाते जाइए । आपका भोजन पत्तल में जूठन के रूप में बहुत कम बचेगा या बिल्कुल हीं नहीं बचेगा । पंगत में हम आलथी पालथी मारकर बैठते हैं , जिसे योग की भाषा में सुखासन कहते हैं । सुखासन में भोजन करने से वह जल्दी पचता है । सुखासन में बैठने से घुटनों की कसरत होती है । ऐसे लोगों के पास गठिया नहीं फटकती । भोजन को पचाने के लिए दिल को कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ती ।

बफर सिस्टम में ऐसी बात नहीं होती । लोग भोजन का पिरामिड अपनी अपनी प्लेटों में खड़ा कर देते हैं । ऐसा वे इसलिए करते हैं कि क्या पता दुबारा भोजन बचे या न बचे । इस प्रक्रिया के तहत भोजन प्लेट में काफी बच जाता है , जो कि आखिर जाया होता है । दूसरी बात यह कि बफर सिस्टम में काफी आपा धापी रहती है । यदि आप एक बार में हीं सारा आइटम ले आ पाते हैं तो आपको अपनी बाजुओं और दम खम पर भरोसा हो जाता है चाहे इस प्रक्रिया में बेशक आपके कपड़े खराब हो जांय । ऐसा हीं भरोसा मुझे भी एक बार हुआ था । खाना लेकर जब मैं अपनी वीरता पर इतरा रहा था , तभी मुझे अपने सामने वाले सज्जन के पीठ व पैर पर कथित वीरता के लक्षण दिखे । उनका सफारी सूट भोजन के छींटों से आप्लावित था । वे निर्लिप्त भाव से मगन मन खा रहे थे । मैंने जल्दी से अपना खाना खत्म किया और चलता बना । इस बात का अंदेशा ज्यादा था कि उन छींटों का इल्जाम मेरे ऊपर आए । कारण , मैं उनके जस्ट पीछे था ।

बफर सिस्टम में नान वेज खाने वाले लोग बाज दफा पूरा डोंगा हीं प्लेट में पलटने की कोशिश करते हैं । शायद उन्हें ऐसा लगता हो कि डोंगे में रखे मीट से बकरा या मुर्गा निकलकर भाग खड़ा होगा । ऐसे हीं किसी बेसबरे से पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कभी कहा था । वे बेसबरे सज्जन आपा धापी में मुर्ग मुस्ल्लम को प्लेट में उड़ेले जा रहे थे । नेहरू ने कहा था – Take it easy . Bird dead . It won’t fly . ( आराम से लें । परिंदा मर चुका है । यह अब उड़ कर नहीं भागेगा ) ।

मुझे पंगत में खाने का अच्छा खासा अनुभव है । मैं इस प्रक्रिया को बहुत पसंद भी करता हूं । लेकिन अब घुटने जवाब देने लगे हैं । मैं सुखासन में बैठ नहीं सकता । मेरे लिए अब बफर सिस्टम हीं मुफीद है । पर पंगत की तरफ अब भी मेरी ललचाई हुई नजर है , पर क्या करूं – अपना मुकद्दर विछड़े हुए , एक जमाना जो बीत गया ।

 एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है ।

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