आर्सेनिक क्षेत्रे भृगु क्षेत्रे

बलिया जनपद को भृगु क्षेत्र कहा जाता है , क्योंकि यह जगह कभी भृगु मुनि की तपस्थली थी । आज यह क्षेत्र पूर्ण रुपेण आर्सेनिक क्षेत्र हो गया है । उत्तर प्रदेश जल निगम के सर्वे के अनुसार इस क्षेत्र के बहुत से गांव आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र में आ गये हैं । यहां कुछ गांवों के नाम दिये जा रहे हैं –

क्रम संख्या गांव का नाम पी पी एम (PPM)
( पार्ट्स पर मिलियन )

1. बाबू रानी 228

2, हास नगर 400

3. उदवन छपरा 360

4. चौबे छपरा 500

5. राजपुर एकौना 500

6. हरिहर पुर 200

7. बहुआरा 130

8. सुल्तानपुर 140

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पानी में आर्सेनिक की मात्रा 10 पार्ट्स पर मिलियन होना चाहिए । भारत सरकार के अनुसार 50 पार्ट्स पर मिलियन आर्सेनिक हो तब भी वाजिब है , जब कि ऊपर का सर्वे मानक से कहीं बहुत ज्यादे दिखा रहा है । लोग यही प्रदूषित पानी पी रहे हैं । इस पानी के पीने से लोगों के हाथों में काले सफेद चित्तीदार धब्बे , खुरदरापन और कड़ापन आ जाता है , जो बताता है कि ये आर्सेनिक के गिरफ्त में पूर्णतः आ चुके हैं । इससे आर्सेनिक जनित कई बीमारियां यथा – आर्सिनोकोसिस , कैरिटोसिस और फेफड़े , त्वचा , गुर्दा व मूत्राशय के कैंसर भी होते देखे गये हैं । सर्व प्रथम 2003 में बलिया के पानी में आर्सेनिक का पता चला । तब से आज तक सैकड़ो लोग आर्सेनिक युक्त पानी पीकर काल कवलित हो चुके हैं । सरकार भी 100 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है , पर वांछित सफलता हाथ नहीं आई है ।

आर्सेनिक मुक्त पेय जल प्राप्त करने के लिए सरकार 66 ओवरहेड टंकियों का निर्माण करवा रही है , जिनसे पानी गुरूत्वाकर्षण के तहत और पाईप लाइन से सभी लोगों को मुहैया करायी जायेगी । जिन हैण्ड पम्पों से आर्सेनिक युक्त पानी आ रहा है , उन्हें लाल निशान से चिंहित किया जा रहा है । लोग अब फिर पुराने दौर में जीने लगे हैं । अब कुओं की कद्र बढ़ गयी है । लोग उनकी साफ सफाई में जुट गये हैं । डोर बाल्टी का युग पुनः आ चुका है । लोग फिर से कुओं का पानी पीने लगे हैं । पानी शुद्ध करने का एक और तरीका कारगर माना जा रहा है । पानी को सूर्य की रोशनी में 12-14 घंटे रख देने से उसका आर्सेनिक 50% उड़ जाता है । ऐसे पानी को बहुत हीं आकस्मिक होने पर हीं प्रयोग में लाना चाहिए ।

बलिया की तरह हीं उत्तर प्रदेश का लखीम पुर जिला भी अति आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र में आता है । यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के 20 से ज्यादे जिले आर्सेनिक से प्रभावित हैं । इनमें बहराईच , बरेली , गोरखपुर , गाजीपुर , चंदौली , कानपुर , इलाहाबाद और वाराणसी जिले प्रमुख हैं । इलाहाबाद के लैलापुर कलां गांव में तो आर्सेनिक का स्तर 707 पी पी एम पहुंच गया है । उत्तर प्रदेश की हीं तरह पश्चिम बंगाल भी आर्सेनिक युक्त क्षेत्र में आता है । भारत के और भी प्रांत आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र में आते हैं , पर वहां की स्थिति इतनी भयावह व विस्फोटक नहीं है जितनी कि बलिया और लखीमपुर की । वैसे पूरे विश्व में 70 लाख लोग आर्सेनिक युक्त पेय जल से परेशान हैं ।

आर्सेनिक पहाड़ों पर होता है । यह वर्षा जल के साथ बहकर मैदानी इलाकों में पहुंचता है । यह गहरायी में जाकर भी अपना अस्तित्व कायम रखता है । जब पानी के लिए हैण्ड पम्प 40-50 मीटर गहरा लगाया जाता है तो उस पानी के साथ यह आर्सेनिक भी बाहर आता है । यह आर्सेनिक जब हैण्ड पम्प के लोहे के साथ मिलता है तो विषैला हो जाता है । शरीर में पहुंचकर यही पानी नाना प्रकार की बीमारियों का नेट वर्क तैयार करता है । आर्सेनिक युक्त पानी पीने से उल्टी , अंतड़ियों में ऐंठन और सिर दर्द भी हो सकता है । आर्सेनिक युक्त पानी की पहचान यही है कि इसका स्वाद नमकीन सा लगता है ।

आर्सेनिक की खोज ईशा पूर्व चौथी शताब्दी में हो चुकी थी । चाणक्य के अर्थ शास्त्र में इसका जिक्र हरिताल नाम से किया गया है । हरिताल को आजकल आर्सैनिक सल्फाइड के नाम से जाना जाता है । हरिताल से प्राचीन काल में अशुद्ध लेखन मिटाया जाता था । आर्सेनिक ज्वालामुखी के वाष्प में , समुद्र तथा अनेक खनिज जलों में पाया जाता है । इसका प्रमुख अयस्क सल्फाइड व आक्साइड है । इसका केमिकल फार्मूला As है । यह आवर्तसारिणी के पंचम मुख्य समूह का एक रासायनिक तत्व है । आर्सेनिक की कम मात्रा दवा के रूप में इस्तेमाल होती है । इसका उपयोग रक्त की कमी , तंत्रिका रोग , गठिया , मलेरिया और प्रमेह में किया जाता है ।

आज इसी आर्सेनिक की वजह से 35 लाख आबादी वाला बलिया जनपद गम्भीर बीमारियों के चपेट में है । मीडिया के लोग आते हैं । फोटो खींचते हैं । रिपोर्ट छापते हैं । नेता आते हैं । भाषण देते हैं । चलते बनते हैं । आर्सेनिक का कहर पूर्ववत जारी है । आर्सेनिक ने कितनी जिंदगी लील ली है । अभी कितनों की बारी आने वाली है । अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाला यह बागी बलिया अब आर्सेनिक दानव से लड़ नहीं पा रहा है । और आर्सेनिक मुक्ति हेतु आवंटित बजट का बंदर बांट बदस्तूर जारी है ।

 एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है ।

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