ज़िंदगी जश्न के सिवा क्या है

किसी हिन्दू या बौद्ध तीर्थ-स्थल पर या हिमालय के किसी एकांत में मोक्ष या निर्वाण के लिए भटकते लोगों की भारी भीड़ क्या आपको हैरान नहीं करती ? ये लोग आवागमन से मुक्त जिस मोक्ष या निर्वाण की खोज में लगे हैं, क्या उसकी कहीं कोई संभावना है भी ? तमाम अस्तित्व, मोह-माया, इच्छाओं और गति से परे अगर कोई मोक्ष है तो वह शून्य की कोई स्थिति ही हो सकती है और कोई भी शून्य अस्तित्व या ऊर्जा के पूरी तरह नष्ट हो जाने से ही संभव है। ऊर्जा चाहे जीवन की हो या पदार्थ की, कभी नष्ट होती नहीं। उसका रूपांतरण होता चलता है। हम छोटी-छोटी ऊर्जाएं हैं और हम रूप बदल-बदलकर इसी प्रकृति में बने रहेंगे। अगला कोई जीवन हमें इस रूप में शायद नहीं मिले, किसी न किसी रूप में मिलेगा ज़रूर। मोक्ष या निर्वाण की अवधारणा दिवास्वप्न है। जीवन से पलायन का धर्मसम्मत तरीका। वैसे भी अपनी इस खूबसूरत दुनिया और जन्म-मरण के इस बेहद रोमांचक और चुनौतीपूर्ण चक्र में ऐसी कौन सी कमी है कि कोई मोक्ष की कामना करे ? जीवन में संघर्ष बहुत हैं, मगर बगैर संघर्ष के कौन-सी उपलब्धि सुख देती है ? ध्यान, समाधि, पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन मानसिक शांति, एकाग्रता और संतुलन के लिए तो ठीक है, उसके माध्यम से अगर आप जीवन के पार कुछ देखना या जाना चाहते हैं तो यह आत्मरति के सिवा कुछ नहीं। वैसी मानसिक एकाग्रता में आप देवी-देवता, भूत-प्रेत, लोक-परलोक जो देखना चाहेंगे, आपको दिखाई पड़ेगा !

यह समूचा ब्रह्माण्ड जीवन का विराट उत्सव है। जीवन की इस ऊर्जा से मुक्ति का कहीं कोई रास्ता नहीं। हमारी पृथ्वी पर जो करोड़ों करोड़ लोग काल्पनिक मोक्ष या कम से कम स्वर्ग की तलाश में अपनी असीम ऊर्जा व्यर्थ कर रहे हैं, उस ऊर्जा का इस्तेमाल अगर जीवन को अर्थ और खूबसूरती देने में हो तो हमें किसी मोक्ष, निर्वाण या स्वर्ग के बारे में सोचने की भी आवश्यकता महसूस नहीं होगी !

 ध्रुव गुप्त

https://www.facebook.com/dhruva.n.gupta

(लेखक स्वतन्त्र टिप्पणीकार और स्थापित साहित्यकार

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