पथलगड़ी के नाम पर गांव बचाइयेगा या झारखंड को सुलगाइयेगा

नया विवाद पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की के उकसाने वाले बयान के बाद उठ खड़ा हुआ है। बंधु वैसे तो पथलगड़ी की परंपरा को सही साबित करने और इसके खिलाफ मुख्यमंत्री रघुवर दास द्वारा जगह-जगह पोस्टर लगाने और विज्ञापन जारी करने के खिलाफ अपना बयान दे रहे थे। मगर बोलते-बोलते या तो बहक गये, या उन्होंने जानबूझकर कह दिया कि काली गाय की बली देना भी हमारी पंरपरा है और अगले साल फरवरी में यह बली दी जायेगी।

बहुत साफ है कि तिर्की ने यह बयान संघ और संघ समर्थक हिंदुओं को उकसाने के लिए दिया है। कई लोग इसके पीछे चर्च और सोशल एक्टिविस्टों की मजबूत लॉबी को देखते हैं, तो कई लोग मान कर चल रहे हैं कि तिर्की संघ की पोलराइजेशन की राजनीति का एक मोहरा बन बैठे हैं। क्योंकि सीएनटी एक्ट के विवाद के बाद भाजपा मान कर चल रही है कि आदिवासियों का वोट उसे नहीं मिलने जा रहा है, इसलिए आदिवासी-गैर आदिवासी की खाई जितनी गहरी होगी, उनकी जीत उतनी ही आसान होगी। जिस तरह उसे देश के दूसरे इलाकों में हिंदू-मुसलिम टकराव से लाभ हो रहा है, वही लाभ वह झारखंड में आदिवासी-गैर आदिवासी विवाद से हासिल करना चाहती है। क्योंकि वह जानती है कि राज्य में 27 फीसदी आदिवासियों के बिना भी वह आराम से सरकार बना और चला सकती है।

मगर इस विवाद से सबसे अधिक नुकसान उस जेनुइन और रचनात्मक आंदोलन का होने जा रहा है, जो पथलगड़ी की परंपरा और संविधान के नाम पर सकारात्मक रूप से रांची और उसके आसपास के इलाकों में शुरू हुआ था। आइये उस आंदोलन की कहानी को समझते हैं, जिसके बारे में झारखंड के बाहर के लोगों को शायद ही खबर हुई होगी।

जमीन के मसले पर झारखंड में सरकार और आदिवासियों के बीच टकराव लंबे समय से रहा है। जंगल, खनिज और दूसरी भू-संपदाओं की वजह से उद्योगपतियों की निगाह हमेशा से झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा जैसे राज्यों की जमीन पर रही है। आजादी के बाद से ही झारखंड के इलाके में बड़े पैमाने पर सरकारी स्तर पर भू-अधिग्रहण हुआ। चाहे बोकारो, जमशेदपुर, धनबाद जैसे शहरों में उद्योग और खनन के नाम पर या रांची में एचइसी के लिए। इनका विस्तार रामगढ़, साहेबगंज, पाकुड़, गोड्डा जैसे इलाके में होने लगा और निजी कंपनियां पांव पसारने लगीं।

इस वजह से लाखों आदिवासियों का विस्थापन हुआ। झारखंड राज्य के आंदोलन में भी यह बड़ा मुद्दा बना कि उद्योग और विकास के नाम पर आदिवासियों के विस्थापन पर रोक लगे। राज्य बना तो एक्टिविस्टों ने इसके लिए लड़ाइयां लड़ीं। मित्तल जैसे उद्योगपति को वापस जाना पड़ा। कई इलाकों में नक्सलियों ने पांव पसारे।

इस बीच संविधान में भी कई ऐसे प्रावधान शामिल हुए जो आदिवासियों की जमीन की रक्षा करते थे। चाहे सीएनटी एक्ट हो, पेशा कानून हो, पांचवीं अनुसूचि का मसला हो या वनाधिकार कानून। मगर जागरूकता की कमी की वजह से आदिवासी अब तक इसका लाभ नहीं उठा पाते थे। इस बीच चाहे कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की, दोनों की नजर इस बात पर रही कि झारखंड में भूमि-अधिग्रहण का मामला कैसे आसान किया जाये? रघुवर दास सीएम बने तो उन्होंने सीएनटी एक्ट में बदलाव कर दिया और इससे आदिवासी भड़क उठे। क्योंकि सीएनटी एक्ट महज एक कानून नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता का सवाल है।

आदिवासियों ने इसे अपनी अस्मिता पर हमला माना और वे जमीन बचाने के लिए सजग हो गये। उन्हें याद आया ओड़ीशा के नियमगिरी पर्वत का मामला जहां आदिवासियों ने ग्राम सभा की ताकत के दम पर अपने पूज्य पर्वत को बचा लिया था। लिहाजा जगह-जगह पथलगड़ी गड़ने लगे और उस पर संविधान की सूचना दर्ज की जाने लगी। यह आंदोलन कुछ इस तरह फैला कि रघुवर सरकार सकते में आ गयी। पूरे रांची शहर को होर्डिंग से पाट दिया गया कि पथलगड़ी असंवैधानिक है। सभी अखबारों को रोज विज्ञापन जारी किये गये। भगवान बिरसा का नाम लेकर इसे गलत बताया गया।

ऐसे में बंधु तिर्की का इसके विरोध में प्रेस कांफ्रेंस करना बहुत स्वाभाविक था। मगर इस कांफ्रेंस में अगर उनका जोर गांव और परंपरा बचाने पर होता तो आज वे एक जेनुइन, रचनात्मक आंदोलन के गंभीर नेता होते। मगर काली गाय की बली का शिगूफा छोड़ कर उन्होंने न सिर्फ इस आंदोलन को कमजोर किया है, बल्कि सरकार औऱ भाजपा के हाथ में बना-बनाया मुद्दा दे दिया है। डर इस बात का है कि गांव को बचाने के लिए शुरू हुए इस आंदोलन की वजह से कहीं झारखंड ही न सुलग उठे।

पुष्प मित्र 

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(लेखक साहित्यकार पत्रकार  और स्वतंत्र टिप्पणीकार है )

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