जीवन रूपी नदी सी लगती है किताब

देश और विदेश के कई फिल्म‌ समारोहों मे अवार्ड लेकर धमाल मचा चुकी फिल्म‌ किताब की स्क्रीनिंग दिल्ली मे 15 मई को फिल्म डिविजन आॅडिटोरियम ,महादेव रोड ,दिल्ली में हुआ । इस मौके पर “गैजेट VS किताब” पर एक परिचर्या भी हुुई जिसमे मुख्य रुप से पद्मभूषण डाॅ. बिन्देश्वर पाठक और मैत्रेयी पुष्पा, उपाध्यक्षा – हिन्दी अकादमी ,दिल्ली सरकार शामिल थी।

 

इस मौके पर हिन्दी अकादमी कि उपाध्यक्षा मैत्रेयी पुष्पा ने कहा, किताब से बड़ा कोई साथी नहीं, कोई हमदर्द नहीं। किताब की संस्कृति बनी रहेगी चाहे कितने ही नए साधन आ जाएं क्योंकि हमारे सोचने के नजरिए को ताकत किताब से ही मिलेगी। किताबें जिंदा रहनी चाहिएं, जिंदा रहेंगी। इस मौके पर सुलभ स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार आंदोलन के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने कहा कि गैजेट, किताब को रिप्लेस नहीं कर सकता। गैजेट पूरक हो सकते हैं लेकिन पढ़ने का जो आनंद, जो रस किताब से आता है, वह किसी और चीज से नहीं आ सकता। गैजेट को चलने के लिए कोई सहारा चाहिए होता है, किताबें बिना सहारे के चलती हैं। इसके साथ साथ इस मौके पर फिल्म किताब के निर्देशक ने अपनी भावनाएँ साझा किए कि किताब का आइडिया उन्हे कैसे और कहाँ से मिला !

कमलेश मिश्र ने कहा कि एक लाइब्रेरी में एक अपने परिचित लेखक की किताबों पर नजर पड़ी और जब उसको उठाने गया और उस पर जमी धूल देख कर मुझे किताबों की पीड़ा, कराह सुनाई दी और तभी यह कहानी मेरे मन में आई और मैंने यह फिल्म बनाई।

इस फिल्म‌ मे मुख्य भूमिका मे टाॅम अल्टर और पूजा दीक्षित है । टाॅम अल्टर की यह आखिरी फिल्म‌ है ।कहानी कि बात करे तो शहर के एक पुरानी लाइब्रेरी मे बूढ़ा लाइब्रेरियन होता है । उसकी खुशी उस लाइब्रेरी के पाठक होते है । वे इस लाइब्रेरियन मे उमंग और उत्साह भरते है ।उनको देख कर ही वह खुश और दुखी होता है । बदलते परिवेश के साथ लाइब्रेरी मे पाठको का आना कम होने लगता है और अंत में सिर्फ एक लड़की बच जाती है । एक दिन वो भी आना बंद कर देती है।

लाइब्रेरियन उस लड़की तक पहुँचता है और पाता है कि वह भी आधुनिक गैजेट के साथ व्यस्त है । क्या वह लड़की वापस लाइब्रेरी की तरफ लौटेगी और अगर लौटेगी तो क्या परिस्थितियाँ होगीं इसके लिए आपको यह लघु फिल्म देखनी चाहिए ।

 

स्क्रीनप्ले थोड़ा और कसा हुआ हो सकता था कही कही यह खटकता है । निर्देशन अच्छा है । कमलेश मिश्र इससे पहले भी कई अलग अलग स्तर पर काम करते हुए आ रहे है । इस मे उनके अंदर का लेखक भी दिखा है ।फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है । चुँकी फिल्म मे संवाद नही है उस समय मजबूत बैकग्राउंड स्कोर जरुरी होता है ।

 

अभिनेत्री पुजा दीक्षित उम्मीद जगाती है । उनके हाव-भाव सहज से लगते है । टाॅम अल्टर अपने श्रेणी मे बहुत अलग और विलक्षण प्रतिभा के धनी थे । इस सिनेमा मे भी वे उन्होंने अपनी भुमिका के साथ न्याय किया है । किताब मे कई अलग अलग बिम्ब है । यह एक जीवन नदी कि तरह है । किताबें घर के बुजुर्गों के जैसी होती है आप जब तक उनके पास रहोगे कुछ ना कुछ सिखने को मिलेगा और संवाद जारी रहेगा । किताब आपके मस्तिष्क से रूह तक का सफर तय करती है । आपको हँसाती है ,रूलाती है और जीवन के सफर को असान बनाने मे आपकी सहायक होती है ‌। किताब निर्जीव होने के बाद भी संवेदनशील और भावनात्मक रुप से जीवटता लिए हुए होती है । यह फिल्म‌ भी आपको जीवन नदी की जैसी है जिसके अलग अलग अयाम सोचने पर मजबूर करती है । किताब की पुरी टीम को शुभकामनाएँ ।

 जलज कुमार अनुपम

https://www.facebook.com/jalajkumaranupam

(जलज कुमार अनुपम  स्वतन्त्र टिप्पणीकार और भोजपुरी हिंदी के युवा  साहित्यकार है )

 

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