भगजोगनी ।

भगजोगनी और मैं एक साथ पढ़ते थे । पांचवी पास के बाद हमने पढ़ाई छोड़ दी थी । भगजोगनी ने इसलिए पढ़ाई छोड़ी कि इसके बाद गांव में पढ़ाई की सुविधा नहीं थी । पांचवी के बाद मिडल की पढ़ाई के लिए रेवती जाना पड़ता , जो कि एक लड़की के लिए निरापद नहीं समझा जाता था । मैंने पढ़ाई इसलिए छोड़ी कि मैं पढ़ना नहीं चाहता था । मुझे गणित विल्कुल समझ नहीं आती थी । मुझे यह बहुत बेतुका लगता था कि कोई पूछे कि एक लट्ठे का 1/4 भाग कीचड़ में है ,2/3 भाग पानी में है और 2 फीट पानी से ऊपर है तो बताओ कि लट्ठे की लम्बाई कितनी है । ये भी पूछने की बात है ? अव्वल तो लट्ठे को गाड़ते समय उसकी लम्बाई नाप लेना चाहिए था। यदि किसी कारण वश नाप नहीं पाए तो उसे उखाड़कर अब नाप लो । दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा । ये क्या बात हुई कि आप इसे एक सवाल की तरह पेश करें और हम इसके लिए अपना बहुमूल्य दिमाग खराब करें । मैंने तो लट्ठे वाले उस सवाल के जवाब को भगजोगनी की कापी से हूबहू उतार लिया था ।

पढ़ाई छोड़ने के बाद मेरे पास कोई विकल्प नहीं था । मैं किसानी करने लगा । शाम को भैंस के लिए घास की व्यवस्था करने की जिम्मेवारी मेरे कंधे पर आ गई । पिता ने दो टूक कह दिया था , अगर पढ़ाई नहीं करनी है तो घास छीलनी पड़ेगी । निठल्ले बैठकर रोटी नहीं तोड़ पाओगे । भगजोगनी भी घास लाने जाने लगी थी । उसके साथ उसकी मौसेरी बहन भी जाती थी । दोनों की माएं हमारे गांव में हीं ब्याहीं थीं । कभी कभार संजोग से हम एक हीं खेत में टकर जाते । बाद में यह संजोग बार बार होने लगा बल्कि यूं कहे कि मैं वहीं जाने लगा जहां भगजोगनी होती थी । शाम को खईंची में दोनों बहने घास लातीं । मैं चादर में लाता था । अब हम एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते थे । “वो पास रहें या दूर रहें नजरों में समाएं रहते हैं , इतना तो बता दो कोई हमें , क्या प्यार इसी को कहते हैं ” वाली बात चरितार्थ होने लगी ।

जवानी की दहलीज पर हमने साथ साथ कदम रखा था । हमारा एक साथ रहना लोगों को पसंद नहीं आया । उसके घर वालों तक शिकायत पहुंची । हमारा एक साथ घास छीलना बंद हो गया । कहते हैं कि जहां चाह होती है , वहीं राह होती है । भगजोगनी और हम रात को उसी स्कूल में फिर से मिलने लगे जिसमें कभी पढ़ते थे । यह स्कूल हमारे बचपन का गवाह था तो जवानी की भी साखी गवाही के लिए भी तैयार हो गया था । हम स्कूल में आधे घंटे के लिए मिलते । भगजोगनी का यह अनवरत अभिसार उसके घर वालों के शक के दायरे में फिर आ गया । हमारे मिलने के समय में उत्तरोत्तर वृद्धि जो होती जा रही थी । उस पर नजर रखी जाने लगी । हम इन सबसे बेखबर थे ।
” अब सर फूटे या माथा यारा हमने तो हां कर ली “

एक दिन हम स्कूल में घेर लिए गये । मैं दूसरे दरवाजे से निकलकर भागा । उसका भाई लाठी लेकर मेरे पीछे दौड़ा था । दौड़ते समय वह लाठी भी चला रहा था । पर मुझे अपने कदमों पर भरोसा था । मैंने चादर फेंकी और अपनी रफ्तार और बढ़ा दी । मैं उसके मार के जोन से निकल गया । लेकिन भगजोगनी पकड़ में आ गई । बाद में पता चला कि उसके भाई ने उसे घर ले जाकर बहुत पीटा था । मेरी चादर भी पकड़ी गई । अब तक जो बात दबी ढकी थी, वह जग जाहिर हो गयी । पूरी बिरादरी खफा हो गयी । एक बाभन के लड़के की यह हिम्मत कि वह हमारी खानदान की लड़की की आबरू इस कदर तार तार करे । मेरे विरुद्ध षड़यंत्र किए जाने लगे ।

एक बार मैं उनके षड़यंत्र का शिकार हो हीं गया । उस विरादरी के कुछ लोगों से मेरी दोस्ती थी । मुझे क्या पता था कि ये मेरे दोस्त हीं मुझे दगा दे जाएंगे । इस विरादरी के लोग अक्सर दिन में सोते थे । रात होते हीं ये सक्रिय हो जाते थे । रात को किसी के खेत से लतरी उखाड़ लाते । रात में हीं कुट्टी काटते । माल मवेशी को खिलाते । कुट्टी की छाड़न भी नहीं छोड़ते । उसे भी झाड़ बुहार कर साफ कर देते । अगले दिन लम्बी तान के सोते । मुझे भी दोस्तों ने इस नेक काम के वास्ते न्यौता दिया । मैं भी उनके इस बहकावे में आ गया । रात को जिस खेत में हम पहुंचे वह दुर्योग से भगजोगनी के भाई का था । मुझे पता नहीं था । दोस्तों ने दगा देने की पूरी तैयारी कर ली थी । तय हुआ कि जो भी पकड़ में आएगा , उसे छुड़ाने के लिए सभी मिलकर खेतवाह से लड़ेंगे ।

घटाटोप अंधेरा था । लतरी कबारने की प्रक्रिया शुरू हुई । अपने दोस्तों में से किसी ने दूर जाकर सीटी बजाई । दूर से सीटी बजाने से मैं जान नहीं सका कि सीटी बजाने वाला दोस्त था या दुश्मन । सारे खेत में रोशनी हीं रोशनी हो गयी । एक साथ कई टार्च जल उठे । मेरे सभी दोस्त बेतरतीब भागे । मैं भी भागा । टार्च वाले लोग पीछा करते हुए एक आदमी के पीछे भागे । शायद उनको वह मेरी कद काठी का लगा होगा । वे उसके नजदीक पहुंचने वाले हीं थे । तभी मेरे मन में दोस्ती का ज्वार उमड़ने लगा । मैंने अपनी भागने की दिशा बदल दी । अब मैं टाॅर्च वालों के पीछे दौड़ रहा था । मैं सोच रहा था कि मेरे और दोस्त मेरे पीछे आ रहे होंगे । आखिर तय भी यही हुआ था । एक अकेला फंस जाएगा तो सभी मिलकर उसकी मदद करेंगे । तभी टाॅर्च वाले लोग उस आदमी को पहचान कर पीछे लौटे । अब मैं भी पीछे लौट चला । भागते भागते मेरे कदम डगमगा गए । मैं जमीन पर मुंह के बल गिरा । मेरी पूरे शरीर पर लाठियों की बरसात हो चुकी थी । मेरे तथाकथित दोस्तों का कहीं अता पता नहीं था ।

मैं तीन माह तक ठीक से चल नहीं सका था । हमारी विरादरी कोई विरोध नहीं कर पायी । चोर रंगे हाथों पकड़ा गया था । इसमें कोई क्या कर सकता था ? उस विरादरी के लोगों ने भी यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि हमें पता नहीं था कि ये झम्मन तिवारी हैं , वरना लतरी कबारने जैसै अदने से काम के लिए हम बाभन की पिटाई नहीं करते । जो भी हो , इतना तो निर्विवाद सत्य था कि मेरी जमकर पिटाई हुई थी । तीन माह तक मेरी आजी ने मुझे दूध हल्दी पिलाया था । मैं अब बाहर निकल कर चलने फिरने लगा था । तभी किसी से पता चला कि भगजोगनी की शादी हो रही है । मैं कर हीं क्या सकता था ? इस मार ने तो मुझे बुरी तरह से तोड़ दिया था । उसके घर वालों को अंदेशा हो गया था कि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी । गांव जवार में तो बात जंगल की आग की तरह फैलती है । इसलिए उन्होंने उसकी शादी तय कर दी ।भगजोगनी व्याह कर अपने ससुराल चली गयी ।

अब मैं बाहर निकल कर खेतों में काम करने लगा था । घास छीलना मेरे बस की बात नहीं रह गयी थी । मुझे घास भगजोगनी की याद दिलाती थी । भगजोगनी को उसके घर वाले कभी तीह परब को भी नहीं बुलाते थे । यहां तक कि मौसेरी बहन की शादी में भी नहीं बुलाया उसे । भगजोगनी की मां दुःखी होती थी । मुझे देखते हीं उसके गालियों का पिटारा खुल जाता । वह मुझे श्रापने लगती । जे हमरा बबुनी के देस छोड़ावल ओकर राम देस छोड़ावसु । मैं चुपचाप वहां से हट जाता । बात भी सही थी । मैं न होता तो भगजोगनी का नइहर कभी नहीं छूटता । उसकी मां भगजोगनी को बगैर देखे हीं मर गयी थी ।

एक दिन भगजोगनी मुझे मिली । मैं किसी की बारात में गया था । उसी शादी में भगजोगनी भी आई थी । वह बहुत कृशकाय हो गयी थी । आंखें धंस गयीं थीं । मैंने उसे पहचाना नहीं । परन्तु भगजोगनी ने मुझे पहचान लिया । कैसै हो झमन ? की आवाज पर मैंने उसकी तरफ देखा था । भगजोगनी को इस हालत में देखने की मैंने सपने में भी परिकल्पना नहीं की थी । उसका छोटा बेटा उसे सहारा दिए हुए था । पता चला कि उसे औवरी का कैंसर हो गया है । वह कुछ दिनों की हीं मेहमान है । वह अपनी ननद की बेटी की शादी में आयी थी । भगजोगनी को इस हालत में देखकर मेरे शरीर के बहुत पुराने चोटों से फिर टीस उठने लगी थी । और भगजोगनी की आंखों से गंगा जमुना बह चली थी ।

एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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