ख़ुदा ख़ैर करे !

क्या जम्मू और कश्मीर में आतंक का रास्ता अख्तियार कर अपने ही निर्दोष देशवासियों और सैनिकों का क़त्लेआम मचाने वाले आतंकी सचमुच मुसलमान हैं ? वे किसी भी अर्थ में मुसलमान नहीं हो सकते। फिर माहे रमज़ान का बहाना लेकर उन्हें एक महीने तक सैन्य कार्रवाई से छूट देने का क्या अर्थ है ? अगर आप उन्हें मुसलमान मानते हैं तो आप बहुत भोले हैं और पिछले अनुभवों से आपने कुछ भी नहीं सीखा है।

यह सबको पता है कि पिछले एक-डेढ़ साल की कठोर सैन्य कार्रवाईयों से प्रदेश के आतंकियों और पाकिस्तान में बैठे उनके आक़ाओं की क़मर बुरी तरह टूटी हुई है। अफ़रातफ़री के इस माहौल में उन्हें सांस लेने की थोड़ी मोहलत चाहिए थी। उन्हें एक महीने का अभयदान देकर आप उन्हें सुधरने का नहीं, फिर से संगठित होकर हत्याओं का नया और पहले से ज्यादा बर्बर सिलसिला शुरू करने का अवसर उपलब्ध करा रहे हैं। होना यह चाहिए था कि रमज़ान के पाक़ महीने में मानवता के इन दुश्मनों के खात्मे का अभियान और ज़ोरशोर से चलाया जाता।

मुझे नहीं लगता कि इस राजनीतिक फ़ैसले में सेना की सहमति ली गई होगी। यह सेना और पुलिस के मनोबल को तोड़ने वाली भारी रणनीतिक भूल है रमज़ान के बाद जिसकी भारी क़ीमत जम्मू और कश्मीर के निर्दोष लोगों और देश के जवानों को चुकानी पड़ सकती है। आतंकियों की बर्बरताओं का सिलसिला अगर माहे रमज़ान के दौरान भी शुरू हो जाय तो किसी को ताज़्ज़ुब नहीं होना चाहिए क्योंकि युद्धविराम का विचार वे पहले ही खारिज़ कर चुके हैं। पूर्व में भी उन्होंने सरकार की सदाशयता का मज़ाक उड़ाया है ! उन्हें चिंता धर्म और उससे जुड़ी नैतिकता की नहीं, हर महीने भारी रक़म मुहैय्या कराने वाले सीमा पार और सीमा के भीतर भी बैठे आतंक के आक़ाओं की है जो किसी भी क़ीमत पर इस देश को टूटता हुआ देखना चाहते हैं।

ध्रुव गुप्त

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(लेखक स्वतन्त्र टिप्पणीकार और स्थापित साहित्यकार है )

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