जीर जीर जीरिया ।

भूलन कोंहार को मैंने कभी नहीं देखा था । वे मेरे जनम से पहले हीं गुजर गये थे । भूलन बो को देखा था । छोटे कद की औरत थीं । रंग काफी दबा हुआ था । बाल सारे झक झक सफेद । उनकी बड़ी बहू घर से भाग रही थी । वे उसे पकड़ कर मार रहीं थीं । खींचकर घर ला रहीं थीं । पर बहु टस से मस नहीं हो रही थी । बहू का पति मने भूलन बो का बेटा दहारी दुर्गापुर के किसी फैक्टरी में काम करता था । जिस साल उसका जनम हुआ था , उस साल बहुत बाढ़ आयी थी । सारी फसल दह (बह ) गयी थी । इसलिए उसका नाम दहारी रखा गया । उससे छोटा तीन चार साल बाद हुआ था । उस साल बाढ़ नहीं आयी थी । फसल भी ठीक ठाक हुयी थी । इसलिए उसका नाम बहाली रखा गया । दहारी के दुर्गापुर जाने का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है । वह गांव में चोरी करता था । एक दिन वह गांव के मुखिया हरिहर पाण्डेय से अपने चोरी करने के कुछ किस्से बता रहा था । मुखिया जी सुनते रहे । बाद में उन्होंने खूंटे में बांधकर उसकी बहुत पिटाई की । पिटाई से जब वह छूटा तो सीधे दुर्गापुर जा पहुंचा ।

बहू गांव में रह रही थी । सास से आए दिन चख चख होती रहती थी । कभी कभार बहू दुर्गापुर भी जाती थी । दहारी उसे मार पीट कर फिर गांव वापस भेज देता । बहू का रंग गोरा था । सुंदर भी थी । केवल एक आंख उसकी छोटी थी । वह उस आंख को दबाती थी । मेरे ख्याल से ऐसे लोगों को हीं अईंच कहते होंगे । भूलन बो की दो बेटियां भी थीं । बड़ी का नाम जीरिया और छोटी का नाम हीरिया था । गांव के लड़के अक्सर उन्हें हीर हीर हीरिया , जीर जीर जीरिया कह कर चिढ़ाते थे । लड़के उनके मरे बाप को भी नहीं छोड़ते थे । भूलन का नाम सीधे तौर पर तो नहीं लेते थे लेकिन कविता के माध्यम से गा कर कहते थे । पर न “भूलना ” ये मेरे गुब्बारे प्यारे । भूलन का नाम कविता में आने से जीरिया और हीरिया का गुस्सा गालियों में फूटता था ।

जीरिया मुझसे छ: सात साल बड़ी थी । उसका रंग गोरा था । वह सुंदर भी काफी थी । शेष तीनों भाई बहन का रंग काफी दबा हुआ था । गांव की हमउम्र औरतें भूलन बो को छेड़ती थीं । तुम जीरिया को कहां से लाई हो ? कहते हैं कि भूलन की भी रंगत काली हीं थी । हीरिया मेरी हमउम्र थी । वह मेरे साथ खेलती थी । वह भगई पहनती थी । पहले के जमाने में लड़के लड़कियां भगई हीं पहना करते थे । भगई कपड़े का एक टुकड़ा भर होता था , जिसे लंगोट की तरह पहना करते थे । उन्हीं दिनों भगई का चलन बंद होने लगा था । लड़कियां छोटी उम्र से हीं शलवार फ्राॅक पहनने लगी थीं । हीरिया के संग हम गोटी खेलते थे । हर बार हीरिया हीं जीतती ।

भूलन बो का मिट्टी का घर था । एक दिन उसे लीप पोतकर चकचक किया गया । दीवारों पर कई तरह की आकृतियां बनाई गयीं थीं । एक जगह लिखा था –

खा लो पूड़ी , पी लो पानी ।
पेट फटे तो हम ना जानी ।

पता चला कि जीरिया का व्याह हो रहा है । जीरिया व्याह कर ससुराल चली गयी । भूलन बो ने पति के न रहने पर भी यथा सामर्थ्य दान दहेज दिया था । दहारी के दुर्गापुर में कमाए हुए पैसे यहां काम आए थे । साल भर बाद जीरिया गांव लौटी । वह हंसती खिलखिलाती सभी सखी सहेलियों से मिलती हिरनी जैसी कुलांचे भर पूरे गांव का चक्कर लगाती रही । खुश थी । घर वर अच्छा मिला था । आठो याम ससुराल की बातें करती रहती । ससुराल की बड़ाई का उसे रोग लग गया था ।

जाड़े के दिन थे । शुकवा उगते हीं घरों से चिउरा कूटने की आवाजें आने लगतीं । पहले गेहूं पिसाने और चिऊरा कूटने के लिए मशीन पर कम हीं लोग विश्वास करते थे । आपसी सहयोग से हीं यह काम आसानी से हो जाता था । जीरिया को भी चिऊरा कूटने के लिए जुगेश मिसिर के घर से बुलावा आया । जीरिया शुकवा उगते हीं उनके घर चली जाती । चिऊरा कूटकर किरिन फूटते फूटते अपने घर आ जाती । जुगेश मिसिर हमारे गांव के नहीं थे । उनकी यहां रिश्तेदारी थी । उनके बच्चे नहीं हो रहे थे । इसलिए ज्योतिष के कहने पर वे इस गांव में आकर रहने लगे थे । यहां आने के बाद से उनके तीन बच्चे हुए । वे दिल फेंक तबियत के थे । और खुद वे भी सुदर्शन थे । अब जब उनको मौका मिला तो उन्होंने मौके से न चूकने का इरादा किया । होता यह था कि जीरिया के जाने के बाद जुगेश की पत्नी दिसा फराकत के लिए बाहर चली जाती थी । उसी मौके का फायदा जुगेश उठा लेते थे ।

एक दो महीने बाद जीरिया फिर अपने ससुराल चली गयी । ससुराल में जीरिया के जाते हीं हड़कम्प मच गया । आनन फानन में जीरिया के ससुराल वालों ने जीरिया के भाई बहाली को बुलवाया और उसे बैरंग वापस मायके भेज दिया । जीरिया का पेट बढ़ रहा था । अब जीरिया का चेहरा उदास और कांतिहीन हो गया था । सुतली रात को भूलन बो जीरिया को लेकर मेरे घर आतीं । मां बेटी जार जार रोतीं । मुझे कुछ समझ आता तो कुछ नहीं आता । भूलन बो का कलपना , रोना सुनकर मेरी मां भी रोती । भूलन बो रोते रोते कहती थीं – का जाने हमरी बछिया के कवन गति होई । हमार बछिया अब कइसे जीहें । फिर रोती कलपती मां बेटी अपने घर चलीं जातीं ।

जीरिया के भाग्य में दैव जाने क्या बदा था । उसके प्रसव के दिन नजदीक आ रहे थे । थक हारकर एक दिन शुकवा उगने से पहले हीं बहाली जीरिया को कहीं छोड़ के आ गया था ।

एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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