शराब बंदी कितनी कारगर हुई है अब तक ।

गुजरात में 1960 से शराब बन्दी लागू है । वहां शराब बंदी एक मजाक बन कर रह गयी है । पहले गुजराती लोग खुद चलकर शराब की दूकान पर जाते थे , अब शराब खुद उनके घर चलकर आ रही है । शराब की होम डिलीवरी होने लगी है । अब वहां ” गली गली गोरस फिरै , मदिरा बैठ विकाय ” वाली बात उल्टी हो गयी है । गुजरात में अवैध शराब का धंधा जोरों पर है । लोग देशी ठर्रा पीते हैं और स्वास्थ्य का नुकसान आसानी से पहुंचाते हैं । गुजराती लोगों की शिकायत है कि उन्हें गुजराती होते हुए भी शराब नहीं पीने दी जाती , जबकि बाहर से आए लोगों पर कोई प्रतिबंध नहीं है । बाहरी लोगों को आराम से परमिट दे दिया जाता है ।

1993-95 के दौरान आंध्रा प्रदेश में भी शराब बंदी लागू की गयी थी । यह बंदी वहां भी यह सफल नहीं हो पायी । हार कर तत्कालीन मुख्य मंत्री एन टी रामाराव को अपने कदम पीछे लेने पड़े थे । तामिलनाडु में भी शराब बंदी सालों साल चली थी , फिर भी यह कामयाब नहीं रही । अंत में द्रमुक सरकार को 1971 में शराब बंदी वापस लेनी पड़ी । कभी हरियाणा में भी शराब बंदी वंशी लाल ने लागू की थी । वे बहुत हीं सख्त जान थे । पर उनकी कड़ाई कोई काम नहीं आयी । पीने वाले दिल्ली से शराब खरीदने लगे । उन्हें प्रोटेक्शन देने के लिए एक अलग एजेंसी खुल गयी । लोग इस एजेंसी को सुविधा शुल्क देते और आराम से शराब लेकर अपने घर पहुंच जाते । कोई रोक नहीं , कोई टोक नहीं । यह एजेंसी सभी सरकारी अमले को अपने काबू में रखती थी । सबका कमीशन उनके यहां पहुंच जाता था । जब वंशी लाल ने 1998 में शराब बंदी हटायी तो सबसे ज्यादा परेशानी इसी प्रोटेक्सन एजेंसी को हुआ था । मोरार जी देशाई की शराब बंदी आपको मालूम हीं होगी । वह भी विफल रही । लोग शराब के बदले मृत संजीवनी सुरा पीने लगे थे । 1977-79 तक देश को बहुत बड़ा राजस्व घाटा उठाना पड़ा था ।

अमेरिका में भी पूरे तेरह (1920-33 ) साल तक शराब बंदी लागू हुई थी । दस हजार के करीब अमेरिकी नागरिक अवैध शराब पीकर मर गये । शराब माफिया ने अवैध शराब का एक बहुत बड़ा उद्योग हीं खड़ा कर दिया । शराब माफिया की चांदी हो गयी । हजारों करोड़ के वारे न्यारे होने लगे । अमेरिकी सरकार के खाते में राजस्व के नाम पर ठन ठन गोपाल रहा ।
मजबूर होकर अमेरिका को शराब बंदी वापस लेनी पड़ी थी । भारत के बिहार प्रदेश में भी प्रदेश सरकार को तकरीबन चार हजार करोड़ के राजस्व नुकसान हो रहा है । लेकिन शराब बंदी लागू है । बहुत से लोग जेलों में बंद हैं । उनकी जमानत नहीं हो रही है । अभी भी लोग जेल जा रहे हैं । पर शराब बंदी सफल नहीं हो पा रही है । शराबी जब मस्ती में आते हैं तो वे बंगाल , नेपाल , झारखण्ड व उत्तर प्रदेश के बलिया , गोरखपुर की तरफ रुख करते हैं , फिर उनकी शराबनोशी पूरी होती है । डा,
दीपक श्रीवास्तव कहते हैं –

बलिया वाली ट्रेन पकड़कर ,
बाहर को जाता पीने वाला ।
बंगाल , यूपी , नेपाल , झारखण्ड में ,
अब बुझती दिल की ज्वाला ।

शराब खोरी सम्पन्नता के समानुपाती होती है । पहले हमारे गांव में इक्का दुक्का हीं शराबी होते थे , अब थोक में मिलने लगे हैं । इसका मूल कारण मनरेगा है । मनरेगा में अक्सर काम नहीं कराया जाता , उसे कागजों में दिखाया जाता है । जाहिर है मुफ्त के पैसों की बंदर बांट होती है । इसमें सबको कुछ न कुछ हिस्सा मिलता है । कुछ पैसा कामगारों के भी हिस्से में आता है । दिल- ए – बेरहम माल – ए – मुफ्त । मुफ्त की चीज काहिली लाती है । इसलिए लोग काहिली का मातम मनाने पहुंच जाते हैं शराब के ठेकों पर । कई राज्यों में 1या 2 रुपए किलो चावल सरकार की तरफ से मुहैय्या कराया जाता है । यह इसलिए कराया जाता है कि कोई भी भूखा न रहे । सबको भोजन मिले । पर इस कृत्य से लोगों में सम्पन्नता आती है । यही सम्पन्नता उन्हें दारू के ठेके पर खींच लाती है । शराब खोरी में सबसे ज्यादा औरतें प्रभावित होती हैं । औरतों पर हिंसक आक्रमण होते हैं । घर का खर्च चलाने में उन्हें दारुण दिक्कत का सामना करना पड़ता है । वे खुद पेट की ज्वाला सहकर भी परिवार का पेट पालती हैं ।

शराब बंदी में नेता लोगों का भी असहयोग है । वे चुनाव के वक्त शराब की नदियां बहा देते हैं । मुफ्त की शराब पीकर लोग वोट देने जाते हैं । ऐसे शराबी लोग लोकतंत्र के साथ क्या न्याय कर पाते होंगे यह तो जगजाहिर है । चुनाव आयोग के ठीक नाक के नीचे ऐसा होता है । चुनाव आयोग श्रांत , क्लांत , निष्चेष्ट पड़ा रहता है । कोई शिकायत मिलने पर वह केवल खाना पूर्ति की कार्यवाही करता है । फिर अपनी आंखें बंद कर लेता है । ऐसे में शराब बंदी कैसे सफल होगी ? यह एक यक्ष प्रश्न है ।

एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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