तानाशाह मुसोलिनी का दुःखद अंत ।

मुसोलिनी के पिता इटली में लोहार का काम करते थे । गर्म लोहे को आकार देते देते उनके विचार भी उग्र हो गये थे । वे वर्तमान व्यवस्था को नफरत की नजर से देखते थे । उनके विचार समाजवादी थे । इन सबका बहुत व्यापक प्रभाव मुसोलिनी के बाल मन पर पड़ा । उसकी माँ एक शिक्षिका थीं । मुसोलिनी कुशाग्र बुद्धि का था । 23 साल की उम्र आते आते उसकी पढ़ाई पूरी हो गयी थी । उसने टीचर की नौकरी करनी शुरु कर दी थी । वह अपने आस पास के लोगों को क्रांतिकारी विचार बांटने लगा था । इस परिपेक्ष्य में उसे अरेस्ट किया गया । कैद से छूटने के बाद वह आस्ट्रीया चला गया । आस्ट्रीया पहुँच कर भी वह चैन से नहीं बैठा । वहाँ उसने आस्ट्रीया को इटली में मिलाने की वकालत की । इस बिना पर उसे आस्ट्रिया से निकाल दिया गया । वह फिर वापस इटली आ गया ।

इटली वापस आ कर मुसोलिनी ने एक समाजवादी पत्रिका” अवन्तो ” का सम्पादन अपने हाथ में लिया । वह प्रथम विश्व युद्ध का दौर था । अवन्तो के सम्पादकीय उग्र विचारों की आग उगल रहे थे । इटली की जनता मुसोलिनी की मुरीद हुई जा रही थी । मुसोलिनी ने 1919 में भूतपूर्व सैनिकों और देशभक्तों की एक मीटिंग बुलवायी । इस मीटिंग से फासिस्ट पार्टी अस्तित्व में आयी । फासिस्ट पार्टी का जोर पूरे इटली पर कायम हो गया । इटली की जनता मुसोलिनी की कट्टर समर्थक हो गयी थी । फासिस्टों ने रेल , डाक तार व सेना पर अपना नियंत्रण कर लिया । मजबूर होकर इटली के सम्राट को मुसोलिनी को सत्ता सौंपनी पड़ी । मुसोलिनी ने 30 अक्टूबर 1922 को प्रधानमंत्री का पद ग्रहण किया । इटली की जनता उसे प्यार से ” दि लीडर ” कहा करती थी ।

मुसोलिनी 1925 तक संविधान के अनुसार कार्य करता रहा । बाद में वह साम्राज्यवादी हो गया । उसने इथोपिया , ग्रीस और अल्बानिया को अपने कब्जे में लेकर द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार कर दी । इस जंग में इटली का भी भारी नुकसान हुआ । मुसोलिनी एक तानाशाह की तरह व्यवहार करने लगा था । उसने अपने विरोधियों को खुफिया एजेन्सियों की मदद से मरवा डाला । इटली की जनता मुसोलिनी के खिलाफ हो गयी । मुसोलिनी जो धूमकेतु बनकर उभरा था , अब वह अपने हीं देश वासियों की आंख की किरकिरी बन गया । रही सही कसर जो थी वह भी पूरी हो गयी जब उसने हिटलर से हाथ मिलाया । 25 जुलाई 1943 को इटली के सम्राट ने उसकी सरकार बर्खास्त कर दी । उसे अरेस्ट कर लिया गया । हिटलर ने अपने प्रभाव का प्रयोग कर उसे कैद से छुड़ा लिया । मुसोलिनी जर्मनी चला गया ।

जब गीदड़ की मौत आती है तो वह शहर की तरफ भागता है । मुसोलिनी की भी मौत आई थी । वह 1945 में जर्मनी से इटली लौट आया । यहां उसे जनता का जोरदार विरोध झेलना पड़ा । अब हिटलर का भी पराभव शुरु हो गया था । उसे रुस से तगड़ी टक्कर मिल रही थी ।ऐसे में मुसोलिनी ने देश छोड़ने का मन बना लिया । वह अपनी प्रेयसी क्लारा पेटासी और कुछ चुनिंदा साथियों के साथ स्वीट्जरलैण्ड के लिए भाग निकला । रास्ते में उन सबकी पहचान हो गयी । वे पकड़े गये । 28 अप्रैल 1945 को मुसोलिनी , उसकी प्रेयसी और उसके साथियों को गोली मार दी गयी । उनकी लाश को मिलान शहर के चौराहे पर नुमाइश के लिए लटका दिया गया । ये लाशें उल्टी लटकीं थीं और बड़ा हीं वीभत्स दृश्य उत्पन्न कर रहीं थीं ।

एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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