जापान में “सुपर डैड ” की खेती होने लगी है ।

जापान में 1992 तक यह मानकर चला जाता था कि घर का काम औरतों का होता है । पुरुष का काम बाहर से कमा के लाना होता है । शेष घर परिवार की जिम्मेदारी औरत को निभानी होती है । ऐसा मानने वाले 60% से ज्यादा पुरुष स्त्री थे । समय का चक्र चलता रहा । अब 45% पुरुष मान रहे हैं कि पुरुष को बाहर की जिम्मेदारी के साथ साथ घर की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए । ज्यादातर घरों में स्त्री पुरुष दोनों हीं कामकाजी होते हैं । जब दोनों कामकाजी होंगे तो जिम्मेदारी भी फिफ्टी फिफ्टी निभानी होगी । बच्चा होने पर 2012 तक जहां 2% पुरुषों ने पितृत्व अवकाश लिया था वहीं 2017 तक पितृत्व अवकाश बढ़कर 7% हो गया । जापानी पुरुष बच्चों को सम्भालते हैं । उन्हें खिलाने , नहलाने , कपड़े पहनाने के अतिरिक्त पुरुष उनका लंगोट भी बदलते हैं । पुरुषों द्वारा किए गये इस कार्य को “इकुमेन ” कहा जाता है ।

जापान में एक त्रैमासिक पत्रिका निकलती है , जिसमें “इकुमेन ” सम्बंधी सामग्री होती है । इसमें इकुमेन सम्बंधी प्रतियोगिता करायी जाती है । विजेता पुरुष को इनाम दिया जाता है । जापान में एक टी वी धारावाहिक काफी लोकप्रिय रहा । इसमें हिरोया नामक पुरुष निर्णय लेता है कि वह पत्नी को बाहर काम पर भेजेगा और खुद इकुमेन बनेगा । वह एक अच्छा ” हाऊस हसबैण्ड ” बनता है । पत्नियों में यह धारावाहिक काफी लोकप्रिय हो चला है । पत्नियां हिरोया से काफी प्रभावित हैं । वे दोनों हाथ उठाकर भगवान से प्रार्थना करतीं हैं – भगवान सबको ऐसा पति दें । इकुमेन अब एक प्रोजेक्ट का रुप ले चुका है । अब इकुमेन प्रोजेक्ट के क्षेत्र में बहुत से पुरुष कूद पड़े हैं । उन्हें इकुमेन में लुत्फ आने लगा है ।

पहले पिता अनुशासन पर नियंत्रण रखते थे । वे जो कुछ भी बच्चों से कहते वह आदेशात्मक होता था । वे एक अच्छे पिता न होकर एक अच्छा प्रशासनिक अधिकारी होते थे । उनके साये में बच्चों का दम घुटता था । अब पहले जैसी बात नहीं रही । पुरुष इकुमेन वीमारी से ग्रसित होने लगे हैं । वे फेस बुक पर बच्चों को कैसे पाला जाय , बच्चों की पसंद / नापसंदगी शेयर करने लगे हैं । बच्चों को भी पिता का यह नया अवतार रास आने लगा है । बच्चे मां से ज्यादा पिता के करीब आने लगे हैं । पिता खुश हो रहे हैं । इकुमेन का प्रोजेक्ट फल फूल रहा है ।पिता खुश हो रहे हैं कि वे तीसमार खां हो गये हैं । वे मां की भी जिम्मेदारी अपने सिर ले रहे हैं , लेकिन माएं खुश नहीं हैं । वे इसे अपने अधिकार क्षेत्र में पुरुषों का अतिक्रमण मान रही हैं । उनकी ममता हिलोरे मारने लगी है । वे यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि कोई पिता उनके बच्चों को मां जैसा प्यार दे सकता है । सच माने तो यह पिता की क्षमता और मां की ममता के बीच खुली जंग है , जिसमें जीत ममता की हीं होने वाली है ।

एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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