सादगी का दीपक – महारानी अहिल्या बाई होल्कर

अहिल्या बाई होल्कर का जन्म 31मई सन् 1725 को चाउड़ी ( चांदवड़ ) अहमदनगर महाराष्ट्र में हुआ था । इनके पिता का नाम मानकोजी शिंदे था । मानकोजी शिंदे एक अति साधारण परिवार से थे , पर संस्कारी थे । उन्होंने अहिल्याबाई में अच्छे संस्कारों का बीजारोपण किया था । इंदौर राज्य के संस्थापक मल्हार राव होल्कर को अपने पुत्र खण्डे राव के लिए एक अच्छी संस्कारी बहु चाहिए थी । अहिल्या बाई में वे सभी गुण मौजूद थे , जो महाराज मल्हार राव होल्कर अपने पुत्र वधु के लिए आवश्यक समझते थे । सन् 1745 में अहिल्या बाई इंदौर राज घराने की बहु बनकर राज महल में आ गईं ।

अहिल्या बाई खंडेराव होल्कर से ब्याह कर अब रानी अहिल्याबाई होल्कर बन गईं । अहिल्या बाई एक कुशल तीरंदाज भी थीं । वे महाराज खण्डे राव होल्कर के साथ युद्ध भूमि में भी जाती थीं । इस युगल को एक पुत्र – मालेराव व एक पुत्री – मुक्ता बाई हुए । सन् 1754 में अहिल्या बाई के पति खंडेराव होल्कर एक युद्ध में मारे गए । मात्र 29 साल की उम्र में अहिल्याबाई होल्कर विधवा हों गईं । पुत्र खण्डे राव की मृत्यु से अहिल्या बाई के श्वसुर मल्हार राव भी कुछ दिनों बाद दिवंगत हो गए ।

महाराज खंडेराव होल्कर के मृत्यु के उपरान्त अहिल्या बाई होल्कर ने राज काज सम्भाला , क्योंकि पुत्र माले राव अभी छोटे थे । महारानी ने अपना रहन सहन सादा कर लिया था । वे सफेद वस्त्र पहनती थीं । जेवर बिल्कुल नहीं पहनती थीं । भगवान की पूजा , अच्छे ग्रन्थ पढ़ना/सुनना आदि उनके दिन चर्या के हिस्सा थे। राजाज्ञा पर अहिल्याबाई होल्कर अपने हस्ताक्षर न कर श्री शंकर लिखा करती थीं । उनका कहना था – ” सम्पति सब रघुपति के आही ।” उनकी मुद्राओं पर शिवलिंग व बेलपत्र बने होते थे । वे एक दार्शनिक महारानी के तौर पर जानी जाती थीं।

उस समय डाकू लुटेरों की राज्य में विकट समस्या थी । विशेष कर आए दिन भीलों के आक्रमण होते हीं रहते थे । एक युवक यशवन्त राव ने महारानी की आज्ञा पाकर सेना को द्रुत गति से सुसंगठित कर चोर लूटेरों व भीलों से राज्य को सुरक्षित किया तो महारानी ने भी अविलम्ब हीं अपनी पुत्री मुक्ता बाई का उस युवक के साथ पाणिग्रहण कर दिया ।

महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने नारी सशक्तिकरण के लिए कई ठोस कदम उठाए । उनका कहना था कि नारी पुरुष से किसी भी मायने में कम नहीं है । नारी को भी पुरुष के समान कठोर होने चाहिए । उनको यह कतई पसन्द नहीं था कि कोई औरत पुरुष के सामने रोए । इसीलिए वे औरतों की समस्या अकेले में सुनती थीं । महारानी से पहले यह आदेश था कि जिस स्त्री का पति दिवंगत हो जाता है और उसकी कोई सन्तान नही है तो उसकी सारी सम्पति राज कोष में जमा हो जायेगी । महारानी ने इस आदेश को रद्द करवाया । उनका कहना था कि यह सम्पति उस औरत का है । उसकी मर्जी है , उसे वह दान करे या अपने उपयोग में लाए । उन्होंने कई विधवाओं को अपनी सम्पति राजकोष में जमा करने से रोका और उन्हें उस सम्पति को सद्कर्म हेतु खर्च करने की प्रेरणा दी ।

महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कलकत्ता से बनारस तक की सड़क बनवाई थी । उन्होंने कई जगह प्याऊ , सराय , घाट , बावड़ी इत्यादि भी बनवाए थे । भूखों के लिए कई सदाव्रत ( अन्न दान ) केंद्र खोले थे । विश्व प्रसिद्ध विश्व नाथ मन्दिर का निर्माण उन्होंने ही करवाया था । लगभग हर बड़े शहर में महारानी द्वारा बनवाया हुआ कम से कम एक मन्दिर आज भी मौजूद है ।

महारानी अहिल्या बाई होल्कर का 42 साल की उम्र में एक और दुःख से सामना हुआ । उनके पुत्र माले राव का सन् 1766 में निधन हो गया । पुत्र वियोग से महारानी टूट गईं । ऐसे में पुत्री मुक्ता बाई व दामाद यशवन्त राव ने उन्हें सम्भाला हीं था कि महारानी के दौहित्र नत्थु राव भी चल बसा । अब तो राज्य का वारिस हीं खत्म हो गया । 62 साल की उम्र तक आते आते दामाद यशवन्त राव भी दिवंगत हो गए और उनकी याद में पागल बेटी मुक्ता बाई भी सती हो गई ।राज्य की चिंता और उस पर प्राणों से प्यारे अपनों के वियोग का भार उनका शरीर सम्भाल नहीं पाया और 13 अगस्त सन् 1795 को उनका निधन हो गया ।

आज इस महान् शासिका को सम्मान देने के लिए इंदौर घरेलू हवाई अड्डे का नाम अहिल्या बाई होल्कर हवाई अड्डा रखा गया है । महारानी के नाम से इंदौर में एक विश्वविद्यालय खोला गया है । भारत सरकार ने सन् 1996 में महारानी अहिल्याबाई के नाम से एक डाक टिकट जारी किया था । आज भी भाद्रपद कृष्ण चतुर्दसी के दिन अहिल्योत्सव मनाया जाता है । विश्व प्रसिद्ध ओंकारेश्वर मन्दिर में आज भी महारानी के नाम से मिट्टी का शिवलिंग बनाकर नर्मदा नदी में तर्पण किया जाता है , जहाँ कभी सहृदय व दयालु महारानी अहिल्याबाई ने वस्त्र उद्योग लगवाया था ।

आपकी इनायतें आपके करम ।

आप हीं बताईये कैसे भूलेंगे हम ?

एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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