छेराछेरा कोठी का धान ला हेर हेरा के ।

ऐसा कहा जाता है कि छत्तीस गढ़ के राजा कल्याण शाह को मुगल बादशाह अकबर ने शाहजादे सलीम को राज काज का ज्ञान देने के लिए दिल्ली बुलाया था । उन्हें वहां रहते तकरीबन आठ साल हो गये थे । जब कल्याण शाह दिल्ली से रतनपुर लौटे तो लोग उनकी आगवानी के लिए नगर के बाहर खड़े थे । राजा को प्रजा ने फूलों से लाद दिया । उनको बाजे गाजे के साथ ससम्मान महल लाया गया था , जहां रानी ने उनकी आरती उतारी थी । औरतों ने मंगल गान गाया था । राजा कल्याण शाह इस आवभगत से गदगद हो गये । उन्होंने खुश होकर अपने खजाने का मुंह खोल दिया । छोटे बड़े सभी को दान दिया था । प्रजा ने भी खुश होकर राजा को धन धान्य से परिपूर्ण होने का आशीर्वाद दिया था ।

उस दिन पौष माह की पूर्णिमा थी । तब से आज तक उस दिन को हर साल छत्तीस गढ़ में सेलेब्रेट किया जाता है । इसे एक उत्सव के रुप में मनाया जाता है । इस उत्सव का नाम है छेरछेरा । यह दान का पर्व होता है । माताएं सुबह सुबह हीं अपने बच्चों को नहला धुला नये वस्त्र पहना छेरछेरा लेने भेज देती हैं । बच्चे दान लेने के लिए हर घर के बाहर आवाज लगाते हैं – ” छेरछेरा , कोठी का धान हेरहेरा ।” लोग उन्हें अनाज या नकद रुपए देते हैं । कभी कभी युवक युवती भी छेरछेरा का दान मांगते हैं । अक्सर युवक डंडा नृत्य करते हैं । युवतियां मिट्टी की गुड़िया बनाती हैं । उन्हें दुल्हन के रुप में सजाती हैं । एक टोकरी में गुड़िया को रख उसके चारों ओर नृत्य करती हैं । गीत गाती हैं । गीत को तारा गीत कहते हैं ।

दान का यह पर्व छत्तीस गढ़ का होली दीवाली जैसा पर्व है । इस दिन कोई गांव से बाहर नहीं जाता । बाहर के कमासुत लोग इस दिन गांव आ जाते हैं । हर घर में रौनक हो जाती है । दरअसल यह पर्व धान की फसल कटने और उसकी मिसाई के बाद मनाया जाता है । घर में लक्ष्मी पूजन होता है । इस दिन काम काज बंद रहता है। बच्चों के स्कूल की लोकल छुट्टी होती है । घर में मुर्रा , लाई और तिलवा खाया जाता है । तिल के लड्डू खाने से ठण्ड का असर नहीं होता । दान से मिले अनाज से खिचड़ी या खीर का भण्डारा लगाया जाता है । युवक और युवतियां स्वांग रचते हैं । नकटा और नकटी बनते हैं जो विदूषक होते हैं ।

छत्तीस गढ़ की महिला क्रांति सेना की महिलाएं भी मंत्री या अन्य गण्यमान्य व्यक्तियों के पास छेरछेरा का दान लेने के लिए जाती हैं । उन्हें दान स्वरुप नकद धनराशि मिलती हैं । यह धनराशि महिलाओं की कल्याण में खर्च किया जाता है । कुल मिलाकर छेरछेरा दान का पर्व है , जिसमें सभी दान देते हैं । सभी दान लेते हैं । छोटे बड़े का कोई भेद नहीं है । हर जाति और धर्म के लोग इसमें भाग ले सकते हैं । कोई रोक नहीं , कोई टोक नहीं । सबको खुला निमंत्रण है ।

एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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