आई हिचकी , हिचकी आई ।

हिचकी आना आम बात है । जब आप मिर्च व मसालेदार युक्त भोजन करते हैं , कार्बोनेटेड पेय पीते हैं , शराब , सिगरेट , बीड़ी और हुक्के के मार्फत अपने अंदर निकोटिन इनहेल करते हैं तो हिचकी आती है । च्यूइंगम चबाने से भी हिचकी आती है । हिचकी का कोई असरदार उपचार अभी तक इजाद नहीं हुआ है । लेकिन कुछ घरेलू नुस्खें हैं जिनकी मदद से इस पर रोक थाम लगायी जा सकती है । ठंडा पानी पीने या बर्फ चूसने से हिचकी थम जाती है । काली मिर्च , आंवला और नीबू में से किसी एक के साथ मिश्री या शहद मिलाकर चूसने या चाटने से हिचकी पर विराम लगता है । प्याज , लहसन भी हिचकी रोकने में कारगर होते हैं । कुछ लोग माचिस की तिल्ली से कान की लटकन को दबाते हैं । इससे पीड़ा होती है । दिमाग का ध्यान बंटता है । हिचकी बंद हो जाती है । मेरे बड़े लड़के की हिचकी बंद हीं नहीं हो रही थी । मैंने उसे डांट दिया । हिचकी बंद हो गयी ।

फेफड़ों और पेट के बीच डाॅयाफार्म होता है । जब डाॅयाफार्म में किसी कारण वश आसामान्य संकुचन होता है तो हिचकी आती है । यह आती है और स्वतः हीं चली भी जाती है । जब यही हिचकी दो तीन दिन तक बनी रहती है तो खाना ,सोना , नहाना धोना , उठाना बैठना सब मुहाल हो जाता है । ऐसे में हमें डाक्टर की शरण में जाना चाहिए । डाक्टर हिचकी आने के कारणों का पता करेगा । दवा देगा । दवा कारगर होगी तो हिचकी अवश्य बंद होगी । लगातार हिचकी आते रहना एक बीमारी है ।इस बीमारी को चिकित्सिकीय भाषा में टाॅरेट सिंड्रोम कहते हैं । यह बीमारी किशोरावस्था में डेवलेप होनी शुरू होती है और जीवन पर्यंत चलती है । इसका कोई निदान नहीं है । दवाइयों से इसे नियंत्रित किया जा सकता है । टाॅरेट सिंड्रोम एक न्यूरो विहेवियरल डिसआर्डर है ।

इस साल ( 2018 ) में एक फिल्म आई थी । फिल्म का शीर्षक ” हिचकी ” था । फिल्म की नायिका रानी मुखर्जी थीं । नायिका को टाॅरेट सिंड्रोम की बीमारी है । उसे लगातार हिचकी आती है । वह टीचर बनना चाहती है । हिचकी के कारण उसे 18 बार इंटरव्यू में फेल होना पड़़ता है । 19 वीं बार जाके वह सफल होती है । वह टीचिंग करती है । टीचिंग का उसका सपना पूरा होता है ।नायिका अपनी बीमारी का इलाज कराती है । उसे पग पग पर छात्र और स्टाफ के मजाक का पात्र बनना पड़ता है । सभी उसकी हिचकी से परेशान हैं । लेकिन वह परेशान नहीं है । वह अपने कदम आगे बढ़ाती रहती है ।उसने हिचकी के साथ जीना सीख लिया है । उसका मजाक बनाने वालों को झुकना पड़ता है । सभी उसे वह सम्मान देते हैं , जिसकी वह बहुत पहले हकदार थी । ” है काम नहीं मुश्किल , अगर ठान लीजिए ” का मंत्र अंततः उसके काम आया ।

ऐसी मान्यता है कि जब कोई याद करता है तो हिचकी आती है । खास कर जवां दिल एक दुसरे को याद करते हैं तो हिचकी आती है । यह डिजिटल इण्डिया का दौर है । हिचकी आई नहीं कि आप फोन पर पूछ सकते हैं – क्या तुमने मुझे याद किया ? फेसबुक, मेसेंजर और ह्वाट्सप पर पूछ सकते हैं – खैरियत तो है ? अब तो चिट्ठियों का दौर खतम हीं हो गया है । हिचकी भी डिजिटल बन गयी है । बूढ़े बेचारे बेगाने होते जा रहे हैं । उनका खैरमकदम जानने के लिए कोई उनको याद नहीं करता । यही कारण है कि बूढ़ों को हिचकी नहीं आती । उनको खांसी आती है । अगर हिचकी आती भी है तो उसका कारण किसी का याद करना नहीं होता है । उन्हें हिचकी अन्यान्य कारणों से आती है । इसलिए वे नहीं सोचते कि उन्हें कौन याद करता होगा ? याद जवां दिल एक दूसरे को करते हैं और इसी वजह से उनको हिचकी भी आती है । हिचकी जवां दिलों को आती है , क्योंकि वे दूरी सहन नहीं कर पाते ।

दो जवां दिलों का गम दूरियां समझती हैं ।
कौन याद करता है हिचकियां समझती हैं ।

एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

 

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