ततैया बैरी खा गयी रे !

कल रात की सुबह मैंने सपना देखा । ततैया मेरे सपने में आई । सुबह के वक्त नींद नहीं तंद्रा होती है । इसलिए मैं जान गया कि यह सपना है । सपने में ततैया का आना अशुभ माना जाता है । सपना देखने वाले के दुर्दिन आ जाते हैं । मैंने ततैया को डपटते हुए कहा –

“तुम्हें मेरे सपने में नहीं आना चाहिए । तुम अशुभ हो “।

ततैया फट पड़ी –

“क्यों मधुमक्खी का आना शुभ होता है क्या ?”

मैंने कहा –

“क्यों न उसका आना शुभ होगा ? वह हमें शहद जो देती है ?”

ततैया हंस पड़ी –

” इसीलिए वह जंगल में जाकर तुमसे दूर अपना छत्ता बनाती है ताकि तुम्हारी बदनीयत से बच सके । लेकिन तुम उसे चैन से कहां रहने देते हो ? तुम वहां भी जाकर उसके शहद की डकैती करते हो ।”

मैं चुप रहा

ततैया आगे बोली –

” तुमने तो मधुमक्खी को भी अपना गुलाम बना रखा है । उसे बक्से में पालते हो । उसका शहद निकालते हो । कहां वह पराग चूसने वाली , कहां तुम उससे चीनी के घोल की शहद बनवाते हो । यह शहद बिल्कुल ही कृत्रिम होता है , जिसे पाकर तुम इतराते हो, इठलाते हो ।”

अब मैं जल भुन उठा –

“चुप कर , जो भी मन में आता है , अनाप सनाप बके जा रही है ।
” काम की न काज की , दुश्मन अनाज की ” । मधुमक्खी से शहद मिलता है , हमें । बेशक हम उससे छीनते हैं । पर तेरे पास क्या है ? तू क्या देती है हमें ? तेरे पास क्या है , जो हम तुझसे छीनेगे ? “

ततैया संयत होकर बोली –

” हम तो खुद परजीवी हैं । हम तुम्हें क्या देगे ? हम खेती के दुश्मन कीटों को डंक मारकर अपने अंडे उसमें छोड़ देते है । ये अंडे अंदर हीं अंदर पनपते हैं । ये उस कीट को अंदर से खोखला कर देते हैं । जब कीट मर जाता है तो हमारे बच्चे उसे चट कर जाते हैं । इस तरह से हम कृषि को इन कीटों से बचाते हैं । ऐसे में हम आपके मित्र हुए , पर आप हमें दुश्मन की निगाह से क्यों देखते हो ?”

मैंने कहा –

“चलो मान लेता हूं कि तुम हमारी मित्र हो , पर तुम तो हमें डंक भी मारती हो । ये कैसी दोस्ती ? कहां की दोस्ती ?”

ततैया की आंखें लाल हो गयीं । वह भावुक हो गयी –

” डंक मारने का काम मजदूर ततैया का होता है । वह तभी डंक मारती है , जब उसके प्राण संकट में आते हैं । वैसे भी मजदूर ततैया डंक मारकर कौन सी खुश रहती है ? बाज दफा उसका कांटा काटे गये शरीर में ही फंस के रह जाता है । अपना डंक निकालने के लिए वह जोर लगाती है । ऐसे में उस मजदूर ततैया का पेट फट जाता है । वह असमय ही मौत को गले लगाने के लिए मजबूर हो जाती है । तुम तो हमें गाली देते हो । गाना गाते हो – ततैया बैरी खा गयी रे !”

मैं सुन रहा था । ततैया बोले जा रही थी –

” तुम इंसानों ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है । खुद तो डंक लगने के बाद किरासन तेल , आक का दूध , नीबू का रस और आम के अचार का गूदा लगाकर ठीक हो जाते हो , पर हमारा घर उजाड़ कर दम लेते हो । हम तो तुम्हें अपना समझते हैं , पर तुम बेगानों जैसा व्यवहार करते हो । हम मधुमक्खी जैसे जंगल में छत्ता नहीं लगाते । हम तुम्हें अपना समझते हैं । इसलिए तुम्हारे घर में छत्ता लगाते हैं । हमारे काटने से तुम्हारे शरीर का किसी भी तरह का संक्रमण हो , वह दूर हो जाता है ।”

डाॅगी के भौंकने से मेरी नींद खुली । सुबह के आठ बज रहे थे । मैंने जल्दी से कागज कलम निकाला । पूरी घटना को कलम बद्ध किया ताकि सनद रहे । ततैया ने जो कुछ कहा है मैं उसकी विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं दे सकता । हां , इतना जरूर कहूंगा कि यह सपना सुबह का था और सुबह के सपने अक्सर सच होते हैं । ऐसा हमारे बचपन में बड़े बुजुर्गों ने कहा था ।

एस. डी. ओझा

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(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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