अगला लोसर मनाएं ल्हासा में ।

वह मुझे श्रीनगर में मिली थी । फुटपाथ पर तिब्बती सामान बेच रही थी । मैंने मजाक में पूछा –

“तिब्बत कब जा रही हो ?”

उसके चेहरे पर सख्त भाव आ गये थे । मुंह लाल हो गया था । उसने बात को चबाते हुए कहा था –

“हम अगला लोसर ल्हासा में मनाएंगे ।”

उस दिन के बाद से हमारी उसकी कई बार मुलाकात हुई , पर मैंने इस प्रश्न को पूछने की कभी हिमाकत नहीं की । हमारी बोल चाल विशुद्ध पेशेवर होती रही । कीमतों की हीं मोल तोल होती । वह बाजिब हीं रेट लगाती ताकि मैं उससे ज्यादा बात न कर सकूं । एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया –

” तुम्हारा नाम क्या है ।”

उसने कहा –

” टाशी दले ”

बाद में मेरे एक लद्दाखी मित्र ने बताया कि टाशी दले का मतलब होता है ” नमस्कार ” । उसने नमस्कार कह मुझसे पिण्ड छुड़ा लिया था । मैं जब तक श्रीनगर में रहा , उसे टाशी दले हीं कहता था । वह कोई विरोध नहीं करती, लेकिन उसके साथ वाली लड़कियाँ मुंह फेर कर हंस पड़तीं थीं ।

जब मेरी श्रीनगर से लद्दाख पोस्टिंग हुई तो लोसर पर्व को करीब से जानने व देखने का मौका मिला । लोसर दो शब्दों से बना है । लो और सर । लो मतलब नया और सर का मतलब साल । तात्पर्य यह कि लोसर नये साल की खुशी में मनाया जाता है । इसकी शुरुआत तिब्बत के नौवें राजा प्यूड गंगयाल के जमाने में हुई थी । यह वह दौर था , जब तिब्बत में कृषि का नया नया अनुसंधान हुआ था । लोगों ने पहली फसल बोयी थी । फसल कटने के बाद उत्सव मनाया गया । कालांतर में यह उत्सव नये साल के आगमन पर मनाया जाने लगा , जिसका नाम लोसर रखा गया ।

लोसर के दिन औरतें पानी के किनारे जाती हैं । वहां धूप बत्ती जलातीं हैं । घरों में रोशनी जलातीं है । एक तरह से दीपावली का माहौल बनता है । घरों में पकवान बनते हैं । छंग (शराब ) और जौ के सत्तू का भोग गोम्पा में लगाया जाता है । सभी प्रसाद ग्रहण करते हैं । सभी नाचते गाते हैं , मोद मनाते हैं । सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं । लोसर तीन दिनों तक चलने वाला त्यौहार होता है । तीसरे दिन लोगों को चांद का इंतजार रहता है । जिस साल मौसम खराब नहीं होता , उस साल चांद के दर्शन हो जाते हैं । वह साल बहुत अच्छा माना जाता है । ईद भी चांद देखकर मनाया जाता है ।

लोसर के दिन छोटी मोटी हुई दुर्घटना को शुभ माना जाता है । लोसर तिब्बत , भूटान , नेपाल आदि देशों में मनाया जाता है । भारत में यह सिक्किम , हिमाचल प्रदेश , उत्तर काशी , लेह लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में धूमधाम से मनाया जाता है । देश काल परिस्थिति के अनुरुप इसके मनाने का ढंग बदलता रहता है । उत्तर काशी में भूटिया लोग आटे की होली खेलते हैं । इस तरह से उनका लोसर होली जैसा होता है । इस साल लोसर 5 फरवरी( आज) को शुरू हो रहा है । 8 फरवरी को इसका समापन है ।

टाशी दले से मिले मुझे तकरीबन 38 साल हो चुके हैं । मैं उम्मीद करता हूँ कि इस साल भी टाशी दले गोम्पा में गयी होगी । पूजा अर्चना की होगी । उसने भगवान से प्रार्थना की होगी कि वह अगला लोसर ल्हासा में मनाए । प्रार्थना में बहुत बल है । उसकी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाएगी । कभी न कभी जरूर पूरी होगी । इसी बात को तुलसीदास ने भी दूसरी तरह से लिखा है –

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। 
से तेहि मिलइ न कछु संदेहू।

एस. डी. ओझा

https://www.facebook.com/sd.ojha.3

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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