रूखा-सूखा, फिर भी वसंत !

वसंत प्रेम और रूमान का मौसम है। यह वह मौसम है जब प्रकृति का सौन्दर्य अपने शबाब पर होता है। प्रकृति में जब नवयौवन उतर आए तो प्रकृति की संतानें वसंत के राग से कैसे बची रह सकती है ? मान्यता है कि वसंत में लगभग सभी जीवित प्राणियों में कुछ शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक परिवर्तन होते हैं। यह परिवर्तन सबसे ज्यादा पक्षियों और मनुष्यों में होता है। शुरुआत करते हैं पक्षियों से। वसंत का प्रवासी पक्षियों की घरवापसी और उनके प्रणय-गीतों से गहरा संबंध है। पक्षियों के प्रणय-राग के बिना वसंत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। न साहित्य में और न जीवन में। वैसे तो अन्य प्राणियों की अपेक्षा पक्षी शीत या उष्णता दोनों के प्रति ज्यादा सहनशील होते हैं, लेकिन शरद् ऋतु में जब भोजन का अभाव हो जाता है तब उष्णता और भोजन की तलाश में उन्हें बाध्य होकर सुदूर देशों में प्रव्रजन करना पड़ता है। अपना शरदकालीन अस्थायी आवास वे स्वयं चुनते हैं। शरद के बाद वसंत के आगमन का संकेत मिलते ही अपने ग्रीष्म आवास या प्रजनन क्षेत्र में पक्षियों का पुनरागमन होता है। प्रवास के बाद हम मनुष्यों की तरह वे न केवल अपने ग्रीष्म निवास-क्षेत्र तक, बल्कि अपने परित्यक्त घोंसलों तक भी पहुंच जाते हैं। जाने-पहचाने ठिकानों पर पहुंच कर पक्षियों के मनमोहक गायन का सिलसिला शुरू होता है और इसी के साथ वसंत के आगमन की उद्घोषणा भी होती है। क्या आपने कभी सोचा है कि पक्षी वसंत ऋतु में ही क्यों गाते हैं ? कहा तो यह जाता है कि यह मौसम के रूमानी होने का असर है, लेकिन पक्षियों में यह रूमान आता कहां से है ? शोध से यह बात सामने आई है कि जिस प्रकार मनुष्यों पर मौसम में उतार-चढ़ाव का असर होता है, उसी प्रकार के बदलाव पक्षियों में भी आते हैं। हम मनुष्यों की तरह उनके हार्मोन में भी वसंत ऋतु में कुछ परिवर्तन होते हैं। यही बदलाव पक्षियों में रूमान का सृजन करता है। उनके हार्मोन में यह बदलाव दिन के लंबे और प्रकाश के तेज होने की वजह से होता है।

हाल के वर्षों में वसंत से पक्षियों का रिश्ता टूटा नहीं तो कमजोर जरूर हुआ है। इस कमजोर होते रिश्ते की सबसे बड़ी वजह है अंधाधुंध शहरीकरण और प्रकृति के साथ हम मनुष्यों का निरंतर अनाचार। अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए जिस तरह हम जीवनदायिनी प्रकृति का दोहन कर रहे हैं उससे पक्षियों के लिए ही नहीं, तमाम जीवित प्राणियों के लिए भी संकट उपस्थित हो गया है। पृथ्वी की जीवनरेखा कहे जाने वाले जंगल और वृक्ष लगातार कट रहे हैं। उनकी जगह ईंट और कंक्रीट के नए-नए जंगल उगाए जा रहे हैं। खेती की जमीन सिकुड़ती जा रही है। तालाब और नदियां सूख भी रही हैं और प्रदूषित भी हो रही हैं। औद्योगीकरण की जल्दबाजी में हम हवा में जहर घोल रहे हैं। पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। जीवन की परिस्थितियों में बदलाव की वजह से जानवरों और पक्षियों की कई-कई प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त होने के कगार पर हैं। विकास और प्रकृति के बीच इस बढ़ते असंतुलन की कीमत आज हम मनुष्य ही नहीं, पक्षी भी चुका रहे हैं। अब महानगरों और छोटे-बड़े शहरों में पक्षी शायद ही कहीं दिखाई देते हैं। गांवों में भी पर्यावरण संतुलन में ह्रास का पक्षियों के निर्बाध आवागमन पर विपरीत असर पड़ा है। अब तो हालत यह है कि गांवों में भी हमारी घरेलू गौरैया ही नहीं, वसंत की संदेशवाहक कोयल के भी दर्शन कम ही होते हैं।

अभी कुछ ही दिनों पहले विशेषज्ञों की एक टीम द्वारा दिल्ली और एन.सी.आर में पक्षियों के हालात का जायज़ा लेने के लिए एक अभियान बिग बर्ड काउंट, 2019 का आयोजन किया गया था। इसमें दो सौ से ज्यादा पक्षी विशेषज्ञों, पक्षी प्रेमियों, शिक्षकों और छात्रों ने दिल्ली और आसपास के कई वन्य जीवन-स्थलों और पार्कों में घूम-घूमकर पक्षियों की अलग-अलग प्रजातियों का पता लगाया, उनकी संख्या की गिनती की, उनकी तस्वीरें लीं। उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण से यह पाया गया कि पिछले कुछ सालों से पक्षियों की प्रजातियों में ही नहीं, उनकी संख्या में भी निरंतर कमी आई है। यह निष्कर्ष देशी ही नहीं, विदेशी पक्षियों के मामले में भी सच है। पक्षियों की घटती संख्या के लिए विशेषज्ञ पर्यावरण प्रदूषण और धुंध को मुख्य कारण मान रहे हैं। पक्षियों की प्रजाति और उनकी संख्या को अच्छे वातावरण का संकेतक माना जाता है। उनकी संख्या का कम होना प्राकृतिक संतुलन और जीवन के लिए खतरनाक संकेत हैं। दिल्ली का यह अध्ययन कमोबेश देश के लगभग तमाम बड़े और छोटे शहरों पर लागू होता है। गांवों में प्रदूषण का स्तर भले कम हो, लेकिन वृक्षों तथा जलाशयों की कमी और शिकारियों की बढ़ती संख्या के कारण पक्षियों ने गांवों से भी नाता तोड़ना शुरू कर दिया है। एक सवाल जो हम सबको परेशान करना चाहिए लेकिन नहीं कर रहा है, वह यह है कि बिना पक्षियों के वसंत की पहचान हो तो कैसे हो !

प्रकृति में तेज-तेज परिवर्तन और बिगड़ते पर्यावरण का असर पक्षियों पर ही नहीं, हम मनुष्यों पर भी पड़ा है। अब हमारे घरों के आंगन में और छज्जों पर न तो गौरैया की चहक है और न पिछवाड़े के बगीचे में कोयल की कुहुक। हमारे आस-पड़ोस से वृक्ष और जल के स्रोत लगातार गायब हो रहे हैं। जीवन की जटिलताओं और उनसे उत्पन्न तनाव तथा अवसाद ने हमारे भीतर की तमाम कोमल भावनाएं छीन ली हैं। अब न मन में वसंत का रूमान रहा और न देह की पोर-पोर से उठती मीठी-मीठी कसक। वसंत का आना अब हमारे लिए सूचना मात्र है। कभी वसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया था। रूप व सौंदर्य के देवता कामदेव के घर पुत्र के आने की खबर पाते ही प्रकृति झूम उठती थी। वन और वृक्ष उसके लिए नवपल्लव का पालना डालते थे। फूल वस्त्र पहनाते थे। पवन झूले झुलाती थी और कोयल गीत सुनाती थी। विश्व साहित्य में वसंत को ऋतुओं का राजा कहा गया है। वसंत के लिए कृष्ण ने गीता में कहा है – मैं ऋतुओं में मैं वसंत हूं। कभी हमारी तमाम संस्कृतियां अपने युवाओं को इस मौसम में प्रेम की अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान करती थी। प्राचीन भारत में बसंत उत्सव और मदनोत्सव की लंबी परंपरा रही है जिसमें प्रेमी जोड़े एक दूसरे के प्रति अपने प्रेम और आकर्षण का सार्वजनिक रूप से इज़हार करते थे। प्रकृति से रिश्ते शिथिल होने के साथ हमारे कथित सभ्य समाजों में धीरे-धीरे वह परंपरा विलुप्त हो गई। प्रकृति से गहरे जुड़ी हमारी आदिवासी संस्कृतियां अपने युवाओं को प्रेम की अभिव्यक्ति का यह अवसर आज भी प्रदान करती हैं। यह एक स्वस्थ और यौन कुंठारहित समाज की निशानी है।

प्रकृति से हमारे रिश्ते कमजोर होने और जीवन में अवसाद के बढ़ने के साथ हमारे देश में प्रेम का विरोध भी बढ़ा है। प्राचीन परंपराओं के विपरीत आज लगभग सभी धर्मों के स्वघोषित ठेकेदारों का मानना है कि प्रेम उनकी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। ये वे लोग हैं जिन्हें लड़ाई-झगड़े, मारपीट और सांप्रदायिक दंगों के रूप में नफ़रतो के सार्वजनिक प्रदर्शन से कहीं कोई आपत्ति नहीं। प्रेम की अभिव्यक्ति इनकी नजर में अपराध है। जिन संस्कृतियों में राधा-कृष्ण तथा लैला-मजनू का प्रेम आदर्श माना जाता है, उनमें प्रेम को लेकर लोगों में इस क़दर प्रतिरोध हैरान करता है। प्रतिरोध भी ऐसा जिसकी अभिव्यक्ति हत्या तक में ज़ायज मानी जाने लगी है। यह बात इन्हें कौन समझाए कि प्रेम की तमाम वर्जनाएं और अवरोध मनुष्य-निर्मित हैं। ईश्वर या प्रकृति ने तो प्रेम, स्वप्न और उड़ने की अनंत इच्छाओं का ही सृजन किया है। स्वस्थ प्रेम का विरोध प्रेम से वंचित कुंठित और अभागे लोग ही कर सकते हैं। इस देश में नफ़रत करने वाले लोगों के लिए घरों और सार्वजनिक स्थलों से लेकर देश की संसद तक में जगह सुरक्षित है। प्यार करने वाले आज अपने लिए एक कोना तलाश रहे हैं। इस पृथ्वी पर क्या प्रेम के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए ? प्रेम अगर है तो यह हर हाल में अभिव्यक्त होगा। आप इसे रोकेंगे तो यह असंख्य कुंठाओं और हज़ार विकृतियों में सामने आएगा।

सच्चाई यह है कि वसंत अब किताबों में ही रह गया है। उसके आने-जाने की सूचना अब हमें पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया से ही मिलती है। प्रेम के इस ऋतू में न अब प्रकृति का वह मादक रूप दिखता है, न मासूम पक्षियों का वह प्रणय-गान सुनाई देता है और न हम मनुष्यों को अपनी कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति के ही पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। वसंत तभी लौटेगा जब प्रकृति अपने असली स्वरुप में लौटेगी। जब पृथ्वी एक बार फिर वृक्षों की हरीतिमा से भर जाएगी। जब हमारी नदियां निर्मल और अविरल होंगी। जब गांवों को उनके तालाब लौटा दिए जाएंगे। जब घर-आंगन और वन-उपवन एक बार फिर से चिड़ियों के प्रणय-गीतों से गुलजार होंगे। जब प्रेम की कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति के प्रति हमारा कृत्रिम प्रतिरोध रुकेगा। प्रकृति और जीवन का संपूर्ण स्वीकार और सम्मान ही वसंत है। विरोध करना है तो नफ़रतों का विरोध करें ! प्रेम एक ख़ुशबू है और ख़ुशबू को बांध लेना किसी के बस की बात नहीं।

ध्रुव गुप्त

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(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और हिंदी के प्रसिद्द साहित्यकार है )

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