देवी या शैतान की बेटी ?

‘महिला दिवस’ पर स्त्री सशक्तिकरण की तमाम चर्चाओं के बीच कुछ सवाल हमेशा से अनुत्तरित रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि समानता के संघर्ष में स्त्रियों ने लंबा रास्ता तय किया है। स्त्रियां अब मानसिक मजबूती के साथ आर्थिक स्वतंत्रता भी हासिल करने लगी हैं। उनके प्रति पुरुषों के दृष्टिकोण में बदलाव जरूर आया है, लेकिन यह बदलाव बहुत सीमित और बाहरी ज्यादा है। दरअसल स्त्रियों की असमानता की जड़ें पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता से ज्यादा खुद स्त्रियों की बेपनाह भावुकता में है। सदियों से पुरुष सत्ता उनकी इस भावुकता से खेलती रही है। झूठी तारीफें कर हजारों सालों तक दुनिया के तमाम धर्मों, संस्कृतियों ने योजनाबद्ध तरीके से उनकी मानसिक कंडीशनिंग की हैं। उन्हें क्षमा, त्याग, करुणा, प्रेम, सहनशीलता और ममता की प्रतिमूर्ति बनाकर। पुरुषों के साथ उनकी बराबरी की बात कोई नहीं करता। या तो वे देवी हैं या नरक का द्वार, शैतान की बेटी और ताड़ना की अधिकारी। अगर स्त्रियां धर्मों और संस्कृतियों की नज़र में इतनी ही ख़ास हैं तो यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि किसी भी धर्म में सर्वशक्तिमान ईश्वर केवल पुरूष ही क्यों है ? अब तक हमारे तमाम अवतार, धर्मगुरु, पैगंबर और नीतिकार पुरूष ही क्यों रहे हैं ? क्यों पुरूष ही आजतक तय करते रहे हैं कि स्त्रियां कैसे रहें, क्या पहने-ओढ़े और कितना परदा करें ? पुरुष अराजकता के बीच रिश्तों और घर को बचाने की ज़िम्मेदारी स्त्रियां की ही क्यों है ? स्त्रियों को देवी का दायित्व सौंपने वाले पुरुष खुद देवता क्यों नहीं बन सके ? उन्होंने तो यहां तक तय कर रखा है कि मरने के बाद दूसरी दुनिया में स्त्रियों की कैसी भूमिका होगी। स्वर्ग या जन्नत में जाकर भी अप्सरा या हूरों के रूप में उन्हें पुरूषों का दिल ही बहलाना है।

हमारा नीतिशास्त्र स्त्रियों के व्यक्तित्व और स्वतंत्र सोच को नष्ट करने के पुरुष-निर्मित औज़ार हैं जिन्हें अपनी गरिमा मानकर स्त्रियों ने स्वीकार ही नहीं किया हैं, सदियों से अपनी आने वाली पीढ़ियों को स्त्रीत्व की उपलब्धि बताकर उन्हें गर्व से हस्तांतरित भी करती आई हैं। क्या दुनिया की आधी और श्रेष्ठतर आबादी को अपने इशारों पर चलाने की मर्दों की शातिर चाल को नकारने का समय नहीं आ गया है ? महिलाओं को अब अपनी बेपनाह भावुकता से मुक्त होकर यथार्थ की जमीन परखनी होगी। उन्हें महिमामंडन की नहीं, स्त्री-सुलभ शालीनता के साथ थोड़ी स्वतंत्र सोच, थोड़े स्वतंत्र व्यक्तित्व और थोड़ी आक्रामकता की ज़रुरत है। स्त्री का जीवन कैसा हो, इसे स्त्री के सिवा किसी और को तय करने का अधिकार नहीं है। अगर पुरुष-निर्मित भावनात्मक जकड़न से आप निकल सकीं तो साल के तीन सौ पैसठ दिन आपके, वरना एक दिन की बादशाहत आपको मुबारक हो !

ध्रुव गुप्त

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(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और हिंदी के प्रसिद्द साहित्यकार है )

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