समुद्र-मंथन : भारत का पहला श्रमिक विद्रोह !

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में इतिहास लेखन की परंपरा नहीं रही है। हुआ यह है कि घटनाओं को चमत्कारिक रूप देने, अपने आश्रयदाता राजाओं या सामंतों को अतिमानव सिद्ध करने और शत्रुओं को निकृष्ट तथा अमानवीय दिखाने की कोशिश में इतिहास को तोड़ मरोड़कर ऐसे प्रस्तुत किया गया कि तर्क और विवेक की कसौटी पर वह कपोल कल्पनासे ज्यादा कुछ नहीं लगता। हमारे पुराण वस्तुतः इतिहास ही हैं। बस उन्हें तार्किक, समाजशास्त्रीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पढ़ने की जरूरत है। पुराणों में प्रमुखता से वर्णित समुद्र-मंथन या अमृत-मंथन प्राचीन इतिहास की एक बेहद महत्वपूर्ण घटना है जिसे इसी दृष्टिकोण से पढ़ा और समझा जाना चाहिए। पुराणों में इसे एक अलौकिक घटना के तौर पर वर्णित किया गया है। एक ऐसी घटना जिसने देवताओं को अमरत्व प्रदान कर असुरों पर हमेशा के लिए उनकी श्रेष्ठता स्थापित कर दी। इस घटना को आसुरी शक्तियों पर अच्छाई के विजय के तौर पर भी देखा जाता रहा है। समुद्र मंथन के पूरे घटनाक्रम को तर्क की दृष्टि से देखें तो यह उस युग के सामंतों और संपन्न व्यवसायी वर्ग द्वारा सीधे-सादे मेहनतकश लोगों के शोषण और उससे उपजे विद्रोह का आख्यान है। प्राचीन भारत में उत्तर तथा पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में रहने वाली आर्य जातियां अपने को देव कहती थीं। इसपर मतैक्य नहीं है कि ये आर्य या देव जातियां वहां की मूल निवासी थीं या बाहर से आकर इस भूभाग में बस जाने वाले कबीले। आर्य अपनी आजीविका के लिए कृषि और व्यापार पर निर्भर थे। कृषि को उन्होंने यज्ञ का नाम दिया था जिसके विस्तार के साथ वनों की कटाई की आवश्यकता महसूस हुई। पूर्वी और दक्षिणी भारत में अपने विस्तार के क्रम में उनका उन क्षेत्रों के मूल निवासियों – असुर, नाग, दैत्य, दानव जैसी जाति के लोगों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। ये मेहनतकश जनजातियां अपने भोजन और आजीविका के लिए पूरी तरह वनों पर आश्रित थीं और इसीलिए उन्हें कृषि या यज्ञ के नाम पर वनों की कटाई से आपत्ति थी। फलतः आर्यों द्वारा कृषि के विस्तार के क्रम में उनका वनों में रहने वाली जनजातियों से संघर्ष हुआ। हजारों साल तक वर्चस्व के लिए चले इस संघर्ष को पुराणों में देवासुर संग्राम कहा गया है। विलासी और कर्मकांडी देवों की तुलना में पूर्व और दक्षिण भारत के मूलनिवासी ज्यादा परिश्रमी, बलशाली और पराक्रमी हुआ करते थे। देवासुर संग्राम में कई बार असुर राजाओं ने देवों को पराजित कर उनके वैभवशाली स्वर्ग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था। देव उनकी तुलना में ज्यादातर असहाय ही दिखते हैं। पुराणों में असुरों से मार खाकर अपनी सहायता के लिए उन्हें जगह-जगह ब्रह्मा, विष्णु, शिव या देवी दुर्गा के आगे गिड़गिड़ाते देखा जा सकता है।

तत्कालीन आर्य राजाओं और व्यापारियों के समुद्र पार के देशों से व्यापारिक संबंध थे। भारतीय धर्मग्रंथ और पुराण व्यापार के सिलसिले में आर्यों की समुद्र-यात्राओं के असंख्य दृष्टान्तों से भरे हुए हैं। समुद्र पार के कुछ देशों में उनके उपनिवेशों की चर्चा भी आई है। कृष्ण ने भी अपने राज्य की व्यापारिक समृद्धि के लिए समुद्र तट पर स्थित द्वारका को अपने राज्य की राजधानी बनाया था। आर्यों की समुद्र की व्यापारिक यात्राओं में आर्य व्यापारियों के साथ पूजा-पाठ करने वाले उनके पुरोहित और उस समय के वैज्ञानिक माने जाने वाले ऋषि-मुनि भी शामिल होते थे। ये व्यापारिक यात्राएं सुरक्षित नहीं थीं। इन यात्राओं में अर्जित संपत्ति को समुद्र में समुद्री दस्युओं और जंगलों तथा पहाड़ों में असुर, दानव या दैत्य कहे जाने वाले लोगों द्वारा लूटने की असंख्य घटनाएं वेदों और पुराणों में दर्ज हैं। ऋगवेद तो इन दस्युओं को कहे गए अपशब्दों और शापों से भरा पड़ा है। व्यापार के दूर देशों तक फैलाव के साथ इन समुद्र-यात्राओं में सुरक्षा के लिहाज़ से कुछ अलग तैयारी की आवश्यकता थी।

आरामतलब देवों ने अपनी सहायता के लिए जीवट श्रमिकों और दस्युओं से मुकाबले में सक्षम कुछ प्रखर अनार्य योद्धाओं को शामिल करने की जरुरत महसूस की। असुर तथा नाग जनजातियों में ऐसे लोग बहुतायत से उपलब्ध थे, मगर असुरों और नागों से परंपरागत शत्रुता रखने वाले आर्यों में उनसे ऐसी कोई मांग करने का नैतिक साहस नहीं था। इसकी संभावना भी कम थी कि देवों द्वारा बार-बार छली गईं अनार्य जातियां उनका ऐसा कोई प्रस्ताव स्वीकार भी कर लें। अंततः उनकी मदद के लिए उनके दो नेताओं – विष्णु और शिव को आगे आना पड़ा। विष्णु ने देवराज इंद्र को अपना दंभ छोड़कर संधि के लिए असुरों के नेता बलि से बात करने की सलाह दी। देवराज इंद्र ने बेमन से ही सही, बलि के आगे व्यापारिक संधि का प्रस्ताव रखा। शिव की सलाह से बलि ने उनका यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

आर्यों और अनार्य जनजातियों के बीच इस दुर्लभ संधि के बाद शुरू हुआ समुद्र-मंथन कहा जाने वाला देवों का अबतक का सबसे बड़ा व्यापारिक अभियान। नाविकों, श्रमिकों और पहरेदारों के तौर पर इसमें असुर और नाग जाति के लोग शामिल हुए। इस अभियान में देवों और असुरों ने मंदराचल पर्वत को अपनी मथनी अर्थात केंद्र बनाया तथा नाग जाति के प्रचण्ड योद्धा बासुकी को रस्सी यानी पथ-प्रदर्शक। समुद्र में स्थित द्वीपों और समुद्र पार के कई देशों में जाकर उन्होंने अपने देश से लाए गए सामान बेचे और उन देशों से कुछ दुर्लभ वस्तुएं खरीदीं या लूटीं। लंबे समय तक चली इस कठिन यात्रा में उन्हें ढेर सारी संपत्ति के अलावा चौदह अनमोल रत्न भी हाथ लगे। पुराणों के अनुसार वे चौदह रत्न थे – कामधेनु गाय. उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सरा रम्भा, लक्ष्मी, वारुणी, चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष, शंख, अमृतघट, वैध धन्वन्तरि और हलाहल। आर्यों की व्यापारिक यात्राओं में यह पहला अवसर था जब बिना किसी बाधा या लूटपाट के उनका इतना बड़ा अभियान सफल हुआ।

जब देवों और असुरों के बीच रत्नों के बंटवारे का समय आया तो सदा की तरह देवता बेईमानी और छल पर उतर आए। चौदह रत्नों में से सुंदरी लक्ष्मी और कौस्तुभ मणि का विष्णु ने वरण कर लिया। कामधेनु गाय देवों की प्रशस्ति गाने वाले ऋषि-मुनियों को दे दी गई। ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष और सुंदरी रंभा को देवराज इंद्र ने रख लिया। उच्चैःश्रवा घोड़ा सूर्य के हिस्से में आया। असुरों, नागों और दैत्यों के हाथ सिर्फ वारुणी लगी। हलाहल विष के कारण संसार पर संकट उपस्थित हो गया था। संसार को विष के घातक प्रभाव से बचाने के लिए देवों और असुरों में समान रूप से लोकप्रिय शिव ने स्वेच्छा से हलाहल का पान कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया जिसके बाद उन्हें नीलकंठ का नया नाम मिला। बंटवारे में अन्याय को लेकर असुरों में भयंकर असंतोष था। मुसीबत तब शुरू हुई जब अमरत्व प्रदान करने वाले अमृत-घट के साथ आखिरी रत्न वैद्यराज धन्वंतरि प्रकट हुए। देवों के छल से गुस्साए असुरों ने धन्वन्तरी के हाथों से अमृत-घट छीन लिया। असुरों और देवों के बीच संघर्ष की नौबत आ गई। विष्णु ने मोहिनी रूप धरकर अमृत के वितरण के लिए देवों और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बिठाया। अपने रूप से असुरों को भ्रमित कर मोहिनी देवों को अमृत पिलाने लगी। देवताओं की यह चाल असुरों को समझ नहीं आई, लेकिन दैत्य राहु उनका छल समझ गया। अमृत पीने के लिए उसने देवता का रूप धरा और जाकर उनकी पंक्ति में बैठ गया। अपने हिस्से आया अमृत उसने पीना शुरू ही किया था कि विष्णु ने उसे पहचान लिया। अमृत की बूंदें गले के नीचे उतरने के पहले ही विष्णु ने सुदर्शन चक्र से राहु का गला काट दिया। इस तरह अमृत की एक बूंद भी अनार्यों के हाथ नहीं लगी।

समुद्र मंथन वस्तुतः शोषण और छल का एक रूपक है जिससे हमें उस युग के सामंतवाद और पूंजीवाद को देखने-समझने की दृष्टि मिल सकती है। दुर्भाग्य से इस रूपक को देवों द्वारा पालित पुरोहितों और ऋषियों ने कुछ इस एकतरफा और चमत्कारिक तरीके से प्रस्तुत किया कि लोग इसे देवताओं का अलौकिक और न्यायपूर्ण कृत्य मान बैठे। यह भी संभव हुआ क्योंकि देश की अनार्य जातियों ने अपना इतिहास स्वयं नहीं लिखा। या शायद उनका लिखा हुआ कालांतर में नष्ट हुआ अथवा नष्ट कर दिया गया। हमारे पुराणों में देवासुर संग्राम या समुद्र मंथन का वही विवरण मौजूद है जो पुरोहितों ने अपने राजाओं, व्यापारियों या सामंतों को प्रसन्न करने के लिए लिखा था। घटना के संबंध में अनार्य जातियों का पक्ष हमें पता नहीं। आज के वैज्ञानिक युग में समद्र मंथन की इस एकपक्षीय कथा की पुनर्व्याख्या की आवश्यकता है। यह इसीलिए भी आवश्यक है क्योंकि शोषण और छल का यह सिलसिला तब के राजतंत्र से लेकर आज के लोकतंत्र तक कभी रुका ही नहीं है।

समुद्र मंथन अथवा संपति के संग्रह और उसके असमान और अन्यायपूर्ण बंटवारे का सिलसिला आज भी जारी है। फर्क इतना भर है कि आधुनिक भारत में आर्यों या देवों की जगह सत्ताधारियों, सत्ता के दलालों, पूंजीपतियों, कारपोरेट घरानों और अफसरशाहों ने ले ली है। लोक की आड़ में सत्ता के तमाम सूत्र इनके हाथों में हैं। इन एक-दो प्रतिशत से भी कम इन लोगों ने देश की नब्बे प्रतिशत से ज्यादा संपत्ति और संसाधनों पर छल-बल से कब्ज़ा किया हुआ है। देश के निर्माण में लगे श्रमिकों, अन्नदाता किसानों, कुशल कारीगरों और यहां तक कि बड़े औद्योगिक तथा व्यावसायिक घरानों को जीविका के लिए अपनी बौद्धिक क्षमता बेचने वाले मध्यवर्गीय लोगों की हालत क्या आज भी प्राचीन असुरों, दानवों, दैत्यों और नागों से बेहतर है ? उनके श्रम को आज भी उसका जायज हिस्सा और अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाता। आज भी अपने श्रम का मोल और सामाजिक बराबरी का अपना अधिकार मांगने वालों का वही हश्र होता है जो राहु का हुआ था।

ध्रुव गुप्त

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(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और हिंदी के प्रसिद्द साहित्यकार है )

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