फिजी द्वीप पर हिंदी का अलख जगाते गिरमिटिया

बात उन दिनों की है , जब कहा जाता था कि ब्रिटिश – सूरज कभी अस्ताचल गामी नहीं होता । उसी क्रम में फिजी पर भी ब्रिटिश का अधिपत्य था । यहाँ की मुख्य फसल गन्ना के उत्पादन हेतु मजदूरों की समस्या विकट थी । फिजी की आदिम जातियों का रुझान गन्ने के उत्पादन की तरफ नहीं था . वे शिकार , जंगली फल व शहद के शौक़ीन थे । वे गन्ने के उत्पादन के परिश्रम से बचते थे । फिजी के निकट के द्वीपों से मजदूर लाए गए , लेकिन वो कामयाब नहीं हुए । आखिरकार ब्रिटिशर्स का ध्यान भारतीय मजदूरों पर गया , जिन्होंने मॉरीशस , सूरीनाम व गुयाना में गन्ना उत्पादन में कीर्तिमान स्थापित किया था ।

15 मई सन् 1879 को भारतीय मजदूरों की पहली खेंप फीजी पहुँची । इन मजदूरों से 5 साल का एग्रीमेंट किया गया था । चूँकि ये मजदूर पढ़े लिखे नहीं थे , इसलिए ये एग्रीमेंट को गिरमिट कहा करते थे और गिरमिट से हीं ये मजदूर गिरमिटिया कहलाने लगे । सन् 1916 तक फीजी में 60 हज़ार मजदूर पहुँच चुके थे ।

5 साल का एग्रीमेंट खत्म होने के उपरान्त भी ये भारतीय मजदूर वापस नहीं आए । इन लोगों ने फीजी में हीं जमीन खरीद ली और यहीं बस गए । 40 साल तक ये रामायण , महाभारत , आल्ह खण्ड , बैताल पचीसी , सिहांसन बतीसी और तोता मैना के किस्से एक दूसरे को मुहजबानी सुनते / सुनाते रहे , लेकिन सन् 1920 आते आते बच्चों को पढ़ने / पढ़ाने की आवश्यक्ता महसूस होने लगी । भारत से हिंदी की पुस्तकें मंगाई गईं । जिन किस्से कहानियों को ये मुहजबानी सुनते / सुनाते थे ; अब उनकी किताबें भारत से मंगाई जाने लगी । किस्सा कहानियों के कारण बैठकें होने लगीं । आल्ह खण्ड , रामायण , भरथरी आदि ग्रन्थों की स्वर लहरियां फीजी की फिजाओं में लहराने लगीं ।

सन् 1920 तक भारतीय मजदूरों का एग्रीमेंट खत्म हो गया वे स्वतन्त्र हो , फीजी में अपनी स्वयं की खेती करने लगे । मन्दिरों का निर्माण होने लगा । धर्म प्रचार हेतु ब्राह्मण पुरोहित आगे आए । रामायण पाठ हेतु पुरुष व महिला मण्डली का गठन होने लगा । राम नवमी , कृष्ण जन्माष्टमी , होली व दिवाली आदि त्योहारों के आयोजन होने लगे ।

1970 – 71 के दौर तक देश आज़ाद होने के बाद भी सभी पाठ शालाओं में पढ़ाई का माध्यम हिंदी हीं रही । कई पढ़े लिखे लोग हिंदी में साहित्य रचना करने लगे । जैसे जैसे प्रकाशन की व्यवस्था होने लगी , वैसे वैसे हिंदी के समाचार पत्र व पत्रिकाएं अस्तित्व में आने लगीं । जब दीनबन्धु सी ऍफ़ एंड्रूज जैसे फादर फीजी में आए तो उन लोगों ने उदारता का परिचय दिया । उन्होंने भारत वासियों को अपनी भाषा , संस्कृति व सभ्यता के विकास हेतु उद्यम प्रयास करने हेतु प्रेरित किया ।

कमला प्रसाद मिश्र जैसे उच्च कोटि के कवि फीजी की धरती पर पैदा हुए हैं । मिश्र जी की कविताएँ मैंने पढ़ी हैं . इनकी कवितायें किसी भी दृष्टिकोण से भारतीय छायावादी कवियों से कमतर नहीं हैं । कमला प्रसाद मिश्र ने कविता के साथ साथ पत्रकारिता की तरफ भी ध्यान दिया है । इनके द्वारा सम्पादित जय फीजी बहुत हीं चर्चित पत्रिका रही है । मिश्र जी ने फीजी लोगों को लिखने के लिए भी प्रोत्साहित किया है । ये मूलतः प्रकृति के चितेरे कवि हैं । हवाई जहाज से नज़र आते सघन मेघों पर लिखी इनकी कविता बहुत ही सुंदर बनी है । इन्हें फीजी के राष्ट्र कवि का दर्जा प्राप्त है ।

इसी प्रकार पंडित विवेकानंद शर्मा ने गद्य लिखने में नाम कमाया है । उनकी लिखी हुई प्रमुख किताबें निम्न प्रकार हैं –
1.. फीजी में सनातन धर्म के सौ साल का इतिहास ।
2.. जब मानवता कराह उठी ।
3.. गुलाब के फूल ।

गिरमिटिया लोगों के देश फीजी में हिंदी की ज्योति जलने की प्रक्रिया अब शुरू हो चुकी है , जो किसी भी हालत में नहीं बुझेगी । यह अखण्ड रहेगी । जय हिंदी ! जय फीजी !! जय भारत

 

ई. एस . डी. ओझा

https://www.facebook.com/sd.ojha.3

 

(लेखक ITBP के  भूतपूर्व डिप्टी कमांडेंट और  स्वतंत्र टिप्पणीकार है )

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