मांगी नाव न केवट आना…

सुमन्त को विदा कर के राम जैसे ही गङ्गा के तट पर पहुँचे तो देखा, केवट कमल पुष्प की भाँति खिला हुआ मुस्कुरा रहा है… राम समझ गए, यह मानेगा नहीं।
राम निकट पहुँचें तो मुस्कुराते केवट के मुख से बोल फूटे- आइये प्रभु! बड़ी देर लगा दी आने में। जाने कितने युगों से आप को ढूंढ रहा था।
राम मुस्कुराए। वे सब समझ रहे थे… कहा, ” पार उतार दो मित्र! आज राम याचक बन कर आया है।”
केवट की आँखों मे जल भर आया। बोला, ” जानते हैं महाराज! मेरे साथ-साथ यह धरती, यह सृष्टि, गङ्गा मैया, यह उनका तट, सब जाने कितने युगों से इस पल की प्रतीक्षा कर रहे थे। यह समय का सबसे महान कालखण्ड है जब समूचे जगत को पार उतारने वाला एक निर्धन केवट से स्वयं को पार उतारने की याचना कर रहा है।”
राम केवट के मनोभावों को समझ रहे थे, उन्होंने उसे सहज करने के लिए कहा, ” आज तुम्हारा ही समय है मित्र! आज के तारणहार तुम्ही हो। चलो, पार करा दो।”
केवट ने राम की ओर श्रद्धा से देखा और कहा, ” आप मुझे बार-बार मित्र क्यों कह रहे हैं प्रभु? मैं तो आपका दास हूँ।”
राम गम्भीर हुए। कहा, ” जीवन में जो एक बार भी छोटा सा उपकार कर दे, वह मृत्यु के समय तक मित्र ही होता है मित्र! तुम तो मुझे पार उतार रहे हो। और जो उपकार भूल जाय वह राम नहीं हो सकता, राम के लिए तुम जन्म भर मित्र ही रहोगे। चलो अब शीघ्रता करो…”
केवट की मुस्कान लौट आयी। कहा, ” इतनी शीघ्रता क्यों महाराज? पहले मूल्य तो तय हो जाय। जीवन भर नाव खे कर एक-एक वेला का अन्न अर्जित करता रह गया, आज एक ही बार में सात जन्मों भर के लिए बटोर लेने का अवसर मिला है। बोलिये देंगे? सकारिये तो नाव खोलूँ…”
“अरे माँग लो मित्र! राम घर से कुछ भी ले कर नहीं चला, किन्तु तुम्हारी हर इच्छा की पूर्ति का वचन देता है। मांग लो…”
केवट ने मुख से कुछ नहीं कहा पर उसकी आँखें बोल रही थीं, ” अधिक नहीं प्रभु, बस जो दे रहा हूँ वही लौटा दीजिएगा। यहाँ मैं आपको पार करा रहा हूँ, वहाँ आप मुझे पार उतार दीजिएगा।”
राम ने देखा सीता की ओर, क्षण भर को दोनों मुस्कुरा उठे। केवट को उसका उत्तर मिल गया, पर वह इस क्षण को अमर कर देना चाहता था। उसने चुहल की, ” प्रभु एक शंका है। आपके चरण छूने से तो पत्थर तक स्त्री में बदल जाते हैं, मेरी लकड़ी की नाव का क्या होगा? एक तो पहले से ही माथा खा रही है, यदि मेरी नाव भी स्त्री बन गयी तो दो-दो को कैसे संभालूंगा? रुकिये, मैं कठौते में जल ला कर आपके पैर से स्पर्श करा कर देखता हूँ कि लकड़ी पर भी तो कहीं वही प्रभाव नहीं…”
केवट भागता हुआ घर पहुँचा और कठौते में जल भर कर ले आया। वह रगड़-रगड़ कर राम के पैरों को धोता जाता था, और उसकी आँखें बरसती जाती थीं। लम्बी प्रतीक्षा का फल मनुष्य को मोम सा कोमल बना देता है। केवट की कई जन्मों की तपस्या सफल हुई थी, वह निश्छल, निर्दोष, विकारमुक्त हो गया था। वह कठौते को माथे से लगा कर पुनः घर रख आया और नाव खुल गयी। नाव प्रतिक्षण राम को अयोध्या से दूर कर रही थी, पर वे प्रतिक्षण अपने कर्तव्यों की ओर बढ़ रहे थे। मनुष्य मोह से दूर होने के बाद ही अपने कर्तव्य के निकट जाता है। राम भी प्रतिपल वन की ओर बढ़ते जा रहे थे। नाव खेते केवट ने कहा, “एक प्रश्न का उत्तर देंगे प्रभु? मैंने आपके मुह से स्वयं के लिए ‘मित्र’ सम्बोधन पाया है। क्या भविष्य मुझे याद रखेगा?”
राम बोले, “जो व्यक्ति इतना सहज हो कि मित्र के चरण धोने में भी अपना सौभाग्य माने, उसकी मित्रता को वर्षों में नहीं युगों-मन्वन्तरों में याद रखा जाएगा। भविष्य युगों युगों तक तुमसे तुम्हारी सहजता सीखेगा। भविष्य में जब छोटी-छोटी उपलब्धियों पर उन्मत्त हो कर लोग दूसरों को छोटा समझने लगेंगे, तब राम और केवट की यह कथा उन्हें राह दिखाएगी।”
नाव गङ्गा के उस पार पहुँच चुकी थी। आगे राम का कर्तव्य था, और पीछे केवट का। दोनों अपने-अपने कर्तव्य की ओर बढ़ चले…

  • सर्वेश तिवारी श्रीमुख
    गोपालगंज, बिहार।

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