न जाने यह चाइनीज अफीम का नशा कब उतरेगा ?

हमारा चन्द्रयान मिशन अपने लक्ष्य से भटक गया है, तो हमारे ही देश के कुछ रहमान, फारुख, खान और बनर्जी इस बात का जश्न मना रहे हैं। हमारे देश के भीतर ही अघोषित रूप से एक दूसरा देश रहता है जो हमारी असफलताओं पर जश्न मनाता है, खुश होता है। ये वही लोग हैं जो देश के पूर्व प्रधानमंत्री की मृत्यु पर उन्हें गाली देते हैं, प्रधानमंत्री की मृत्यु के लिए दुआ करते हैं, क्रिकेट मैच में पाकिस्तान से भारत की हार पर पटाखे छोड़ते हैं। ये वही लोग हैं जो भारत पर आक्रमण करने आने वाले आतंकवादियों का सहयोग करते हैं। हमारे देश के भीतर का यह देश हमारे देश को नेस्तोनाबूद करने के सपने देखता है। दुर्भाग्य यह है कि हम इन्हें पहचान कर भी पहचान नहीं रहे… जाने यह चाइनीज अफीम का नशा कब उतरेगा हमारे सर से…
पर क्या सचमुच इसरो फेल हुआ है? इसरो फेल नहीं हुआ है। इसरो तभी पास हो गया था जब उसने अपने चन्द्रयान को चन्द्रमा के उस अंधेरे ध्रुव पर उतारने का मन बनाया जहाँ अपने यान को उतारने की हिम्मत नासा तक नहीं कर पाता।
गोपालदास नीरज ने लिखा है, “चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है, कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।” कुल मिला कर बस इतनी सी ही तो बात है।
चन्द्रमा का क्या है, मामा का गांव है; आज नहीं गए तो कल चले जायेंगे। दीवाली में नहीं पहुँच सके तो क्या हुआ, होली में पहुँच जाएंगे। और यह भी तय है कि हम ही जायेंगे। भारत से चन्द्रमा पर वे ही जायेंगे जिनके मामा का घर है वह! हमारे यान की असफलता पर खुश होने वालों के बच्चे अभी सैकड़ों वर्ष तक वहाँ जाने के बारे में सोचने लायक भी नहीं होंगे।
आज के दस-बीस वर्ष बाद जब कोई रेड्डी, कोई चिपलूनकर, कोई सिंह, कोई शेट्टी या कोई रामास्वामी चन्द्रमा पर उतरेगा तो वह इस गर्व के साथ उतरेगा कि चन्द्रलोक की इस भूमि पर मेरे बुजुर्गों द्वारा भेजा गया विक्रम यहीं कहीं आसपास ही होगा! उसे ऐसा नहीं लगेगा कि वह वहाँ अकेला है। उस निर्जन लोक में खड़े होकर वह आज के वैज्ञानिकों के असफल प्रयास पर भी गर्व करेगा, क्योंकि उसकी सफलता के मूल में हमारी आज की असफलता ही होगी। यही हमारे वैज्ञानिकों की विजय है।
कल की रात जब हम विज्ञान के क्षेत्र में तनिक असफल हुए, तब हमनें फिर मानवता का इतिहास लिखा। जब हमारा प्रधानमंत्री इसरो चीफ को गले लगा कर उनकी पीठ थपथपा रहा था, तो लगा कि क्या आदमी है यार! कितनी ऊर्जा है इसमें, कहाँ कहाँ पहुँच जाता है… प्रधानमंत्री ऐसा हो तो इसरो वाले साल-दो साल में ही दुबारा चन्द्रयान भेज देंगे और सफलता पूर्वक उतार भी देंगे।
आज मोदी जी के लिए भी दो पंक्तियां लिखने का मन कर रहा है। मिलते तो पूछता, “कहाँ से सीखे हो काका? लेग साइड की बॉल पर ऑफ साइड में छक्के मार देते हो? फेयर नहीं है यह… ऐसे खेलोगे तो पांच दिन तक आपही खेलते रह जाओगे, विपक्षी टीम को खेलने का मौका ही नहीं मिलेगा। यह नहीं चलेगा…”
हमारी यह असफलता क्षणिक है। विज्ञान क्रिकेट नहीं है कि एक बार आउट हो गए तो फिर बैटिंग नहीं मिलेगी, विज्ञान फुटबॉल है, इस बार गेंद गोल में नहीं गयी तो अगली बार मार देंगे। मैच तो चल ही रहा है।
जय हो इसरो की, जय हो भारत की, जय हो हमारी… जय जय

  • सर्वेश तिवारी श्रीमुख
    गोपालगंज, बिहार।

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