प्रेम की पूर्णता भारत के सिवा कहीं नहीं

मनुष्य की पूर्णता कब है, जानते हैं? मनुष्य की पूर्णता तब है, जब अज्ञानी पशु भी उसको देख कर, उससे मिल कर आनंद का अनुभव करने लगे। जब किसी को आपसे कोई भय नहीं हो, जब सबके लिए आप प्रेम स्वरूप हों, तब आप पूर्ण हो जाते हैं।
मानवता के अलग-अलग मापदण्डों पर ध्यान दीजिए, आप समझ जाएंगे कि भारत को विश्व गुरु क्यों कहा जाता था। मानवता की यूरोपीय अवधारणा (ईसाई) कहती है, मनुष्य का मनुष्य से प्रेम हो। उनका प्रेम मनुष्यों तक ही सीमित है। इंसानियत की अरबी परिभाषा कहती है कि “अल्लाह के बन्दों से प्रेम करो।” वे और संकुचित हो गए हैं। लेकिन मनुष्यता की भारतीय परिभाषा कहती है, “जीवों पर दया करो”। सनातन हो या उसके विरुद्ध उपजे बौद्ध या जैन मत हों, सिक्ख सम्प्रदाय हो या कबीर आदि की परम्परा हो, सबमें यह विशेष समानता है कि सब जीवों पर दया करने की बात करते हैं। पिछले पाँच हजार वर्षों से पूरे विश्व में एक हम ही हैं जो सचमुच प्रेम की बात करते हैं।
भारत यहीं हो जाता है। है न?
हमारे प्रेम का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। मनुष्य के इतर सारे जीव-जंतु, नदियाँ-पहाड़-झरने, पेंड़-पौधे तक सब हमारे प्रेम के अधिकारी हैं। इतना ही नहीं, हम धरती के बाहर अन्य ग्रहों तक से भावनात्मक सम्बन्ध जोड़ कर बैठे हैं। चन्द्रमा हमारे लिए मामा हैं, सूर्य हमारे लिए हमारा अभिभावक है, बृहस्पति गुरु हैं.. यह हमारे प्रेम की ब्यापकता है।
इस तस्वीर में दिख रहे व्यक्ति का न रंग-रूप दिख रहा है, न जाति धर्म। न आप उसके क्षेत्र का अंदाजा लगा सकते हैं न उसकी भाषा का। फिर भी आप आँख मूँद कर मानेंगे कि व्यक्ति भारतीय है, व्यक्ति आर्य है। दोनों गायों की बन्द आँखे निहारिये, वे उनके चेहरे पर उतर आए परमानंद की गवाही दे रही हैं।
स्वयं से मिलने वाले को अपने व्यवहार से प्रेम के चरम तक पहुँचा देना ही भारतीय होना है। भारत के बाहर भी, विश्व के किसी कोने में यदि कोई व्यक्ति ऐसा है तो उसे भारतीय मानने का दावा है मेरा, प्रेम का यह चरम रूप ही भारतीयता है।
किसी युग में हमारे पूर्वजों ने मन्त्र दिया था, “कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम”, विश्व को आर्य बनाओ… उन्होंने विश्व को आर्य बनाने के लिए बर्बर लुटेरों का समूह नहीं भेजा, ना ही धन के बदले धर्म परिवर्तन कराने वालों की ठगमण्डली भेजी। उनके लिए विश्व को आर्य बनाने का अर्थ लोगों को अपने सम्प्रदाय से जोड़ना नहीं था, विश्व को आर्य बनाने का अर्थ लोगों के हृदय में प्रेम भरना था। जो जीवों पर दया करे वही आर्य है, जो सबसे प्रेम करे वही भारतीय है।
कुछ लोग आजकल भारतीयों को प्रेम सिखा रहे हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे लोमड़ी गाय को सरलता सिखाये। पिछले दो हजार वर्षों के संक्रमण के बाद भी भारत अभी इस स्थिति में है कि विश्व उससे प्रेम करना सीखेगा, विश्व उससे जीना सीखेगा।
कभी भारत आये पहले मिशनरी ने पोप को लिखे अपने पत्र में कहा था, “भारत में मिशन की कोई आवश्यकता नहीं, यहाँ के हर गाँव मे यीशु से बड़े सन्त हो चुके हैं।” इस तस्वीर में दिख रहा व्यक्ति सचमुच स्वयं में किसी सेंट से हजार गुना बड़ा है।

  • सर्वेश तिवारी श्रीमुख
    गोपालगंज, बिहार।

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