गांधारी-अंधेरे में उजाले की तलाश

नौ बहनों में वह सबसे सुंदर थी। इसलिए पिता ने इसका नाम शुभा रखा था। पिता कहा करते थे वट में कमल खिला है। शुभा की सौन्दर्य की चर्चा पूरे आर्यावर्त में फैल गयी थी। दूर—दूर से राजा महाराजाओं के रिश्ते आने लगे थे। पिता ने पुरुषपुर (आज का पेशावर) के सुदर्शन राजकुमार को शुभा के लिए योग्य वर के रुप में चुना था। तभी सूचना मिली कि हस्तिनापुर से भीष्म पितामह सेना लेकर राज्य के बाहर तक आ पहुँचे हैं। वे अपने पौत्र धृतराष्ट्र का विवाह शुभा से करना चाहते थे। बेकार के खून खराबा से बचने के लिए शुभा के पिता ने भीष्म पितामह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

शुभा को परिस्थितियों के वशीभूत हो पुरुषपुर के सुदर्शन राजकुमार को छोड़कर अंधे धृतराष्ट्र का वरण करना पड़ा। चूँकि शुभा गांधार (आज इसे कांधार कहते हैं) प्रदेश से आई थी इसलिए ससुराल में उसका नया नाम गांधारी रखा गया। गांधारी ने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। उसने कहा था-जब मेरे पति परमात्मा द्वारा प्रदत्त इस धरती का सौन्दर्य नहीं देख सकते तो मुझे भी इस सौन्दर्य को देखने का कोई हक नहीं। गांधारी के साथ उसका भाई शकुनि भी आया था। उसे शतरंज के खेल के साथ—साथ राजनीति की भी शह और मात की कला का काफी ज्ञान था। उसने अपनी इस कला का बखूबी प्रदर्शन किया। धृतराष्ट्र शकुनि की बातों में आकर उसे अपना निजी सचिव बना लिया।

शकुनि का धृतराष्ट्र का निजी सचिव बनना विदुर और भीष्म पितामह को जरा भी रास नहीं आया। शकुनि ने तय कर रखा था कि गांधारी का ही बड़ा पुत्र हस्तिनापुर का राजा बनेगा। इसके लिए वह शुरू से ही जुगत व जुगाड़ करने में लग गया। कहते हैं कि रज्जु के बार—बार घर्षण से पाषाण पर भी निशान पड़ जाते हैं (रसरी आवत जात ते सील पर परत निशान)। शकुनि ने महाराज धृतराष्ट्र को दुर्योधन को राज्यगद्दी देने के लिए मना लिया। ऐसा नहीं था कि गांधारी शकुनि के छल कपट से अंजान थी। उसने एकाध बार महाराज धृतराष्ट्र को आगाह करने की कोशिश भी की थी, पर जन्मांध धृतराष्ट्र की मन की आंखों पर भी पट्टी बंध चुकी थी। नियति गांधारी को कहीं और धकेल रही थी।

गांधारी के जीवन में ऊषा की लाली, फूलों का अप्रतिम सौन्दर्य, मेघों की लुका छिपी और तितलियों की अठखेलियां देखना नहीं बदा था। वह राजभवन के बदलते राजनीतिक समीकरण को भी नहीं देख पा रही थी। हां, वह इसे महसूस कर सकती थी। परन्तु उसके हाथ में कुछ नहीं था। यदि आकांक्षाओं का अस्तित्व नहीं होता तो मानव का जीवन जीने की इच्छा ही नहीं होती।इन्हीं आकांक्षाओं के चलते लाक्षागृह कांड हुआ। पाण्डव माता कुंती के साथ दर—दर की ठोकरें खाने को मजबूर हुए। द्रोपदी का चीर हरण हुआ। हस्तिनापुर से बंधे भीष्म पितामह कुछ नहीं बोले। विदुर बोले तो बहुत बोले, पर उनकी आवाज अधर्म के इस शोर में दबकर रह गयी।

महाभारत का युद्ध शुरू हुआ। संजय धृतराष्ट्र को महाभारत का आंखों देखा हाल सुना रहे थे। संजय को वेदब्यास ने दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। आंखों देखा हाल गांधारी भी सुन रही थी। उसने सुना कि किस तरह निहत्थे अभिमन्यु को छः—छः महारथियों ने घेरकर मार डाला था। इसमें युद्ध नियम का जरा भी पालन नहीं किया गया। सच पूछा जाय तो महाभारत का यह युद्ध पूरी तरह से नियम और धर्म विरुद्ध था। गांधारी ने सुना कि किस तरह भीष्म पितामह के सामने शिख॔डी को खड़ा कर उन्हें शस्त्र रखने के लिए मजबूर किया गया। ऐसे में अर्जुन द्वारा उनका वध किया जाना बिल्कुल अप्रत्याशित कदम था।

अश्वथामा के मरने की झूठी खबर प्रचारित की गयी। गुरु द्रोण के निहत्थे होने पर दृष्टद्दुम्न द्वारा उनका सिर काटना भी युद्ध शास्त्र के खिलाफ था। हाथ कट जाने पर भी भूरिश्रवा का सिर काट लेना, कर्ण का रथ का पहिया निकालते समय वध कर देना, दुर्योधन के साथ गदा युद्ध में भीम द्वारा उसके जांघ पर प्रहार करना ये सभी युद्ध नियम के प्रतिकूल था। गांधारी का दुःख बहुत गहरा हो गया था। ऐसे में जब कृष्ण गांधारी से मिलने आए तो गांधारी ने उन्हें चीख चीखकर शाप दिया था-

“तुमने पूरे युद्ध के दौरान छल कपट का सहारा लिया। जिस प्रकार रणचण्डी ने मेरे सभी बन्धु बांधवों का नाश किया है और हम अकेले रहकर इस संताप को झेल रहे हैं; उसी तरह से तुम भी अकेले रहकर अपने बंधु बांधवों से दूर रह संताप का दंश झेलोगे। तुम्हारी द्वारिका नगरी चौपट हो जाएगी।”

कृष्ण की द्वारिका नगरी वास्तव में चौपट हो गयी थी। उनके सभी बन्धु बान्धव मारे गये थे। स्वंय कृष्ण एक बहेलिए द्वारा हिरण के भ्रम में मारे गये थे। गांधारी, धृतराष्ट्र, कुंती और विदुर वन में तपस्या के लिए चले गये थे। एक दिन वन में आग लगी थी। उस आग में चारों जल कर भस्म हो गये। मरते समय भी गांधारी की आंखों पर पट्टी बंधी थी। वह उम्र भर अंधेरे में उजाले की तलाश करती रही। कथित उजाला उसे कभी नहीं मिला था।

  • ईं. एस.डी. ओझा

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