खूबसूरत लोकतंत्र बनाम अज्ञानता…

देश मे मंदी आ रही है, फेसबुक पर लोग बेचैन है। धड़ाधड़ लेख लिखे जा रहे हैं। सरकार की गलत नीतियों की आलोचना हो रही है। लोग सजग हैं।
कुछ दिनों पूर्व मुझे एक कार्यक्रम में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। विषय था, “गरीबी कैसे मिटायें।” दुर्भाग्य से उस दिन मेरी साइकिल पंचर हो गयी और मेरे पास उसे ठीक कराने के पैसे नहीं थे। हम नहीं जा पाए। बाद में पता चला मेरे स्थान पर मेरे मित्र दिलकबूतर मिसिर ने “गरीबी कैसे मिटायें” विषय पर बड़ा शानदार भाषण दिया था। दिलकबूतर मिसिर आजकल गोपालगंज से गोरखपुर जाने वाली बस पर खलासी का काम करते हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहाँ कोई भी व्यक्ति किसी भी विषय पर बोल सकता है। यहाँ स्वरा भाष्कर और आसाराम बापू मिलकर देश को चरित्र निर्माण का ज्ञान दे सकते हैं, बरखा दत्त और अरुंधति राय स्त्रियों को सुंदर दिखने के नुस्खे बता सकती हैं, कन्हैया कुमार और महबूबा मुफ्ती लोगों को राष्ट्रप्रेम पढ़ा सकते हैं और खुद गांजा पीने वाले लोग तम्बाकू पर लगे प्रतिबंध के समर्थन में आलेख लिख सकते हैं। भारत का लोकतंत्र सचमुच अद्भुत है।
जो मैट्रिक में तीन बार फेल हुए हैं वे अरुण जेटली को घटिया वित्त मंत्री बताते रहे हैं। जिन्होंने इंजीनियरिंग की है वे मध्यकालीन भारत के इतिहास पर बहस करते हुए कहते हैं कि अकबर एक उदार शासक था। जिन्होंने इतिहास पढ़ा है वे मोदीजी की विदेश नीति की आलोचना करते हैं और जिन्होंने राजनीति शास्त्र पढ़ा है वे किसी प्राइवेट स्कूल में तीन हजार के वेतन पर अंग्रेजी पढ़ा रहे हैं। इस देश की शिक्षा व्यवस्था कितनी उत्कृष्ट है, इसका आभास इसी बात से हो जाता है कि देश के सभी राजनैतिक दलों में किसी का राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनीति शास्त्र का विद्यार्थी नहीं रहा।
भारत मे कोई भी व्यक्ति कुछ भी कह सकता है/कर सकता है/पूछ सकता है/बता सकता है। फेसबुक के मेरे एक पत्रकार मित्र हैं, जो पिछले दो वर्षों से बेरोजगार हैं। वे अपने कार्य के प्रति इतने निष्ठावान थे कि किसी समाचार पत्र ने उन्हें नौकरी नहीं दी। आजकल वे आने वाली मंदी के प्रभावों को बताने के लिए रोज लम्बे-लम्बे आलेख लिख रहे हैं।
मैंने मंदी के भय से थर-थर काँपते अपने एक मित्र से पूछा, “भाई पहले यह बता, मंदी आखिर है क्या?”
मित्र ने कहा, “यह तो नहीं पता, पर यह मोदी के राज में आई है तो कोई बुरी बला ही होगी।”
मित्र के पिता मेरे पड़ोस के हाई स्कूल में चपरासी हैं। वे मनमोहन जी के समय में भी T. C देने के लिए सौ रुपये घूस लेते थे, मोदी जी के समय मे भी सौ रुपये ही लेते हैं। उनके लिए मोदी-मनमोहन में कोई अंतर नहीं। हाँ! उन्हीं के घूस वाले पैसे से कैम्पस का जूता पहनने वाला मेरा मित्र कहता है “मोदी सरकार की भ्रष्ट नीतियों के कारण देश मंदी की चपेट में जा रहा है।” मेरा मित्र सही ही कह रहा होगा।
सबसे मजेदार बात यह है कि जो लोग मंदी से भयभीत दिख रहे हैं वे मन ही मन प्रसन्न हैं कि बड़े दिनों बाद इस सरकार को घेरने का मौका मिला है। वैसे इससे भी अधिक मजेदार बात यह है कि जो लोग मंदी की खबरों को गलत बता रहे हैं वे अंदर ही अंदर भयभीत हैं। वे मन ही मन गाली दे रहे हैं कि “इस हरामखोर मंदी को हमारी सरकार के समय ही आना था? साली पिछली सरकार के समय कहाँ थी?” असल में अब इस देश में कोई आम आदमी रहा ही नहीं, सभी किसी न किसी दल के कार्यकर्ता हैं। लोकतंत्र अपने चरम पर है, अब देश में कोई प्रजा नहीं है, सभी नेता हैं।
मंदी के कारण देश पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह मुझे नहीं पता, क्योंकि अर्थशास्त्र मैंने नहीं पढ़ी। हाँ, इतना जानता हूँ कि मंदी यदि आयी भी तो ज्यादा दिन रहेगी नहीं, क्योंकि देश के असंख्य बुद्धिजीवी कह चुके हैं कि यह देश अब रहने लायक नहीं रहा।

  • सर्वेश तिवारी श्रीमुख
    गोपालगंज, बिहार।

 

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