मसाले बसा देंगे प्यार की दुनिया

कहते हैं कि हर पुरुष के दिल में उतरने का रास्ता उसके पेट से होकर गुजरता है, लेकिन पेट से गए रास्ते पर गुरुत्वाकर्षण का नियम लागू होता है। पेट नीचे है। दिल ऊपर है। ऐसे में दिल तक पहुँच बनाने के लिए बूस्टर की जरुरत होती है। पुरुष को अच्छा भोजन बनाकर यदि पत्नी दे तो वह उसके लिए चांद और तारे लाने का भी जोखिम उठा सकता है। उसके दिल में पहुँचने के लिए भोजन को बूस्टर डोज मसाले प्रदान करते हैं। मसाले भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं। हल्दी, अजवाइन, जीरा, इलाइची और लौंग स्वाद के साथ—साथ पाचक का भी काम करते हैं।
भारत विश्व का सबसे बड़ा मसाले का उत्पादक देश है। यह विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश भी है और सबसे बड़ा निर्यातक भी। वैश्विक बाजार में इसकी आधी हिस्सेदारी है। आईएसओ द्वारा सूची बद्ध 109 मसालों में से 75 मसालों का उत्पादन भारत में होता है। प्राचीन काल में भारतीय मसालों की विश्व में बड़ी धूम थी। काली मिर्च तो सोने के भाव बिकती थी। एक पाव अदरक की कीमत एक भेड़ के बराबर थी। मसालों का राजा काली मिर्च और मसालों की रानी इलाइची के स्वाद और सुगंध के पीछे भागते हुए यूरोपीय लोग भारत तक पहुँच गये थे।
मसालों में कई प्राकृतिक गुण होते हैं। मसालों से भोजन तीखा चटपटा बनता है। इनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी होती है। यह एण्टीआक्सीडेण्ट होता है और रक्तचाप नियंत्रण के साथ—साथ यह कोलोस्ट्राल को भी काबू करता है। यह अतिरिक्त कैलोरी को भी जलाता है। हां, बाजार में मिलने वाले मसाला पाउडर से परहेज करना चाहिए। इनमें मिलावट होती है, जो फायदा कम नुकसान ज्यादा करता है।
ईसा पूर्व सिकंदर भारत आया था। विश्व विजय के साथ—साथ उसे मसालों का स्वाद भी खींच लाया था। ये और बात है कि वह भारत में ज्यादा दिन नहीं रह पाया। पोरस से लड़ाई के बाद उसके सैनिकों के हौसले पस्त हो गये थे। इसलिए उसे बाध्यता मूलक अपने देश लौटना पड़ा। उसके बाद सेल्यूकस जैसे लोग आए थे, जिन्हें मुंह की खाकर वापस लौटना पड़ा, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि उस दौर में यूरोप का भारत से मसालों का व्यापार होता था।
सिकंदर और सेल्यूकस के बाद भारत का यूरोप से सम्पर्क टूट गया। अब यूरोपीय लोगों की जगह अरबी लोगों के साथ मसालों का कारोबार होने लगा। ये अरबी भारत से मसाले खरीदकर यूरोपीय लोगों को म॓हंगे दामों में बेचने लगे थे। उस समय यूरोप में इटली सबसे वर्चस्व वाला देश था। अरबी लोग इटली को मसाले बेचते थे, जहाँ से पूरे यूरोप को मसाले पहुँचाए जाते थे। पोलैण्ड पहुँचते—पहुँचते इन मसालों की कीमत आसमान छूने लगती थी। इसलिए पोलैण्ड ने समुद्र मार्ग से भारत की खोज करने की सोची।
वास्को डिगामा को भारत की खोज का जिम्मा सौंपा गया। एक बड़े जहाज में बास्को डिगामा ने अपनी यात्रा शुरु की। इस जहाज में कुछ सैनिकों के अतिरिक्त समुद्री लुटेरे भी थे, जिन्हें समुद्र में यात्रा करने का अच्छा खासा अनुभव था। बास्को डिगामा स्वयं एक समुद्री लुटेरा था। उसे भी समुद्री यात्रा का काफी ज्ञान था। उसमें नेतृत्व क्षमता भी थी। 28 मई 1498 को बास्कोडिगामा केरल के कालीकट की धरती पर अपने पैर धरे थे। यहाँ के राजा जमेरिन ने उसकी बड़ी आवभगत की। बास्को डिगामा मसालों की पहली खेप लेकर पोलैण्ड लौट गया था।
बास्को डिगामा दुबारा फिर 1502 में आया था। अबकी बार वह कुछ और सोच के आया था। उसने युद्ध में जमेरियन को हरा दिया। 16 वीं शताब्दी के अंत तक भारतीय मसालों पर पुर्तगालियों का एकाधिकार हो गया था। पुर्तगालियों के बाद डच और अंग्रेज आए। अंग्रेज तो यहीं खूंटा गाड़ के बैठ गये। उन्होंने मसाले के अतिरिक्त इस देश से बहुत कुछ अपने देश ले गये। यहाँ तक कि गोलकुण्डा की खान से निकाला कोहिनूर हीरा भी। जब 1947 में देश आजाद हुआ तो अंग्रेजों के शोषण से भी हमें आजादी मिल गयी थी। मसाले भी आजाद हो गये थे।

  • ईआर. एस.डी.ओझा

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