एक था सुल्ताना डाकू !

बचपन में देखी नौटंकियों, नाटकों और फिल्मों के एक बेहद मकबूल क़िरदार सुल्ताना डाकू की याद है आपको ? वह सुल्ताना डाकू जो रॉबिनहुड की तरह अमीरों को लूटता था और गरीबों में लुटाया करता था। नौटंकी की मलिका गुलाब बाई ने उसके नाम पर एक नौटंकी खेलकर पूरे उत्तर भारत में उसे लोकप्रियता दिलाई थी। बचपन में मैं उसपर आधारित नौटंकी का कोई भी शो नहीं छोड़ता था। उसके जीवन पर बनी दारा सिंह की फिल्म ‘सुल्ताना डाकू’ मैंने दर्जनों बार देखी थी। यह वह दौर था जब मैं ही नहीं, मेरी पीढ़ी के ज्यादातर लड़के सुल्ताना की तरह डाकू बनने के ख़्वाब देखते थे। आमतौर पर सुल्ताना को गुलाब बाई द्वारा रचित एक काल्पनिक पात्र माना जाता है। कम ही लोगों को पता है कि लोकमानस और लोकगीतों में एक नायक की तरह रचा-बसा सुल्ताना कोई काल्पनिक चरित्र नहीं, बीसवी सदी के दूसरे दशक का देश का सबसे दुर्दांत लेकिन सबसे लोकप्रिय डाकू था। आमजन में एक नायक की छवि वाला ऐसा डाकू जिसे पकड़ने में अंग्रेज सरकार के भी छक्के छूट गए थे। गरीबों के लिए किए गए उसके सामाजिक कार्यों के कारण उसे ‘सोशल बैंडिट’ का नाम दिया गया। उत्तर प्रदेश में अपने अपार जनसमर्थन के कारण वह कई वर्षों तक पुलिस के साथ आंखमिचौली खेलता रहा। अंततः उसके लिए अंग्रेज सरकार को एक विशेषज्ञ पुलिस अधिकारी फ्रायड यंग को लंदन से बुलाना पड़ा था। यंग ने 300 जवानों की मदद से महीनों की मेहनत के बाद उसे गिरफ्तार किया था। इस काम में प्रसिद्ध वन्यजीवन विशेषज्ञ और लेखक जिम कार्बेट ने उसकी मदद की थी। संक्षिप्त ट्रायल के बाद सुल्ताना को फांसी की सज़ा दे दी गई थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद में उसके नाम का एक किला आज भी मौजूद है जहां वह एक अरसे तक छुपकर रहा था। वर्ष 2009 में लेखक सुजीत सराफ ने पुलिस के सामने दिए गए उसके इकबालिया बयान के आधार पर एक चर्चित ऐतिहासिक उपन्यास ‘कंफेशंस ऑफ़ सुल्ताना डाकू’ लिखी थी।

आलेख के साथ है गिरफ्तारी के बाद बेड़ियों में जकड़े सुल्ताना की एक दुर्लभ तस्वीर।

  • ध्रुव गुप्त

 

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