यात्री गण कृपया ध्यान दें…

सरला चौधरी के पिता रेलवे कर्मचारी थे। सभी रेलवे स्टेशनों को एक सर्कुलर जारी किया गया था कि हर स्टेशन पर एक उद्घघोषक की अस्थाई (तीन माह) नियुक्ति की जाएगी। यह नियुक्ति केवल रेलवे कर्मियों के बच्चों के लिए थी। सरला चौधरी ने अपने पिता के कहने पर फार्म भर दिया। उन्होंने सोचा कि कुछ न होगा तो तजुरबा ही होगा। आवाज की जांच में सरला चौधरी पास कर गयीं। 13 जुलाई 1982 को उनका तीन महीने के लिए चयन हो गया। उस समय कोई महिला उद्घघोषक नहीं थी। इसलिए लोगों के लिए यह अजूबा से कम नहीं था। उद्धघोषक खिड़की पर उन्हें देखने के लिए भीड़ इकट्ठी होने लग जाती थी। आवाज के दम पर उनकी यह अस्थाई पोस्ट एक्सटेंशन पाती रही और आखिर में 1986 में इसे स्थायी कर दिया गया।
तत्कालीन महाप्रबंधक आशुतोष बनर्जी ने भी सरला चौधरी की आवाज सुनी। उन्हें यह आवाज बहुत जंची। आशुतोष बनर्जी के कहने पर यह आवाज 1991 में रेलवे की आधिकारिक आवाज बन गयी। सरला चौधरी को घूम—घूम कर हर स्टेशन पर अपनी आवाज रिकार्ड करानी पड़ी, जिसमें कभी—कभी 4 दिन का भी समय लग जाता था। उन्हें मुख्यतः हिंदी, अंग्रेजी और मराठी भाषा में रिकार्डिंग करानी होती थी। बाद के दिनों में उन्होंने रेडियो में अपनी आवाज रिकार्ड करा दी, जहाँ से हर स्टेशन पर यह रिकार्डेड आवाज भेजी जाने लगी। आज से 18 साल पहले उन्होंने रेलवे का यह जाॅब छोड़ दिया था। आजकल वो ओएचई विभाग में कार्यालय अधीक्षक के तौर पर काम कर रही हैं, पर उनकी आवाज आज भी हर स्टेशन पर गूंज रही है-यात्री गण कृपया ध्यान दें। ऐसे में गुलजार एक गीत याद आ रहा है-
नाम गुम जाएगा
चेहरा ये बदल जाएगा
मेरी आवाज़ ही पहचान है
‘गर याद रहे।
कम्पयूटर के दौर में उनकी आवाज को सेन्ट्रलाइज्ड कर दिया गया। उनकी आवाज को स्टैण्ड बाई मोड पर रखा जाता है। सिर्फ जो उद्घोषणा करनी होती है, उससे सम्बंधित कोड को दबाना पड़ता है। कई बार सरला चौधरी को गालियां भी मिलती है, जब उनकी आवाज में उद्धघोषणा की जाती है-अमुक ट्रेन प्लेटफार्म नम्बर 1 पर न आकर प्लेट फार्म नम्बर 3 पर आ रही है। ऐसे में लोगों में अफरा तफरी का माहौल हो जाता है। लोग अपना सामान लेकर प्लेटफार्म नम्बर 3 की तरफ भागते हैं। सरला चौधरी पर दिशा रिनदानी ने एक छोटी फिल्म बनायी थी। इस फिल्म में उनके पति और दोनों बेटियों ने उनकी आवाज पर फख्र किया है।
अब बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि कालांतर में सरला चौधरी की यह आवाज हरेक रेलवे स्टेशनों पर नहीं गूंजेगी। उनकी आवाज को हरीश भिमानी की आवाज से रिप्लेस किया जा रहा है। हरीश भिमानी वही हैं जिन्होंने अपनी आवाज महाभारत धारावाहिक के लिए दी थी। वे इस सिरियल में अक्सर कहते सुने जाते थे-मैं समय हूँ। गोरखपुर व लखनऊ में हरीश भिमानी की आवाज गूंजने लगी है। वाराणसी में यह प्रक्रिया जारी है। आगरा, मथुरा, जयपुर और जोधपुर में भी हरीश भिमानी कब्जा जमा चुके हैं। सरला चौधरी की वह मधुर आवाज एक दिन गुम हो जाएगी। फिर यहाँ “मेरी आवाज ही पहचान है” कहना बेमानी होगा।

  • ई. एस. डी. ओझा

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