बादलों के देश में कूड़ा !

मसूरी से करीब 22 किमी की चढ़ाई के बाद 400 एकड़ में फैला हुआ जॉर्ज एवरेस्ट का इलाका इस पूरी घाटी का सबसे खूबसूरत क्षेत्र है। बादलों का देश कही जाने वाली इस घाटी से गुजरना बादलों का सीना चीरकर रास्ता बनाने जैसा है। यहां बेहद खूबसूरत घाटी भी है, जंगल भी, कलात्मक चट्टानें भी और दूर हिमालय की हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखला का मनोरम दृश्य भी। जॉर्ज एवरेस्ट उन्नीसवीं सदी के शुरू में ब्रिटेन से भारत आए थे। वे इतिहास के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारत और नेपाल के पूरे हिमालय क्षेत्र का विस्तृत सर्वे किया था। यहां ‘द पार्क’ के नाम से प्रसिद्ध उनका आवास भी है और ऑब्जर्वेटरी भी जो अब खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। जॉर्ज के महान योगदान के लिए सरकार ने 1920 में मसूरी से ‘द पार्क’ जाने वाली सड़क का नाम एवरेस्ट रोड और इस पूरे इलाके का नाम जॉर्ज एवरेस्ट कर दिया था।
आज मित्रों के साथ विश्व के महान भूगोलविद् के खूबसूरत क्षेत्र के भ्रमण के दौरान जिस चीज़ ने सबसे ज्यादा दुखी किया, वह था पूरी घाटी में जहां-तहां बिखरे हुए पानी के खाली बोतल, नमकीन के खाली प्लास्टिक और पॉलीथिन बैग। सुखद यह था कि प्लास्टिक का कचरा फैलाने वाले लोगों के समानांतर ग्रीन टीशर्टधारी युवकों और युवतियों एक दल भी चल रहा था जो प्लास्टिक के कचरों को एकत्र कर उन्हें जूट के बोरों में एकत्र करता जा रहा था। वे सभी नेहरू माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट के इंस्ट्रक्टर दिगंबर सिंह के नेतृत्व में इंस्टिट्यूट के छात्र थे जो ओ.एन.जी.सी की सहायता से कई दलों में बंटकर हिमालय को स्वच्छ करने के अभियान में निकले थे। हमने उन सभी युवकों को सलाम किया, कुछ देर अभियान में उनका साथ दिया और यह कसम ली कि जहां तक संभव होगा हम अपने इलाकों को प्लास्टिक के कचरे से मुक्त करने की कोशिशें करेंगे।

  • ध्रुव गुप्त

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