चरवाहे तेरा जीवन

यीशू, मूसा और दाऊद अपने आरम्भिक जीवन में चरवाहे थे। यीशू मसीह ने कभी किसी से कहा था कि वे उत्तम दर्जे के चरवाहे थे। गुरु नानक भी भाई मरदाने के साथ गाय चराया करते थे। मेरे विचार से कृष्ण सबसे आला दर्जे के चरवाहे थे। उनकी बांसुरी की तान निराली थी। बांसुरी की आवाज सुनकर गायें गोपियों के साथ कृष्ण के इर्द गिर्द आ खड़ी होतीं थीं। कारगिल में घुसपैठ की सूचना एक चरवाहे ने ही दी थी। वह दूरबीन से अपने खोए हुए याक को देख रहा था। याक तो दिखाई नहीं दिया, पर उसे घुसपैठियों नजर आ गये। उस चरवाहे ने इसकी सूचना शीघ्रातिशीघ्र आर्मी कमाण्डर को दी थी। कारगिल में भीषण युद्ध हुआ। हम घुसपैठियों को खदेड़ने में कामयाब हो गये थे।
चरवाहे हिमाचल में गद्दी कहे जाते हैं। ये अपने भेड़ बकरियों को लेकर ऊपर के चारागाह में निकल जाते हैं।
सर्दी बढ़ने पर नीचे उतर जाते हैं। कुछ कुमाऊँ की सीमा में दाखिल हो जाते हैं। यहां वे कुछ राजस्व देकर अपनी भेड़ बकरियों को चराते हैं। गढ़वाल में भी यही होता है। कुमाऊँ/गढ़वाल में चरवाहों को भाबर और जम्मू कश्मीर में बकरवाल या बुग्याल कहते हैं। महाराष्ट्र में इन्हें धांगर कहते हैं। चरवाहों का दिमाग बहुत तेज होता है। हालाँकि ये कम पढ़े लिखे होते हैं। इस सम्बंध में एक प्राचीन कहानी प्रचलित है।
एक यहूदी आलिम ने एक चरवाहे से कहा कि कुरआन में एक ही तरह के आयतें कई बार कहीं गयीं हैं। क्या ही अच्छा होता कि इन आयतों को एक बार ही लिखा जाता, जिससे पुस्तक का आकार छोटा होता। इससे ले जाने और पढ़ने में आसानी होती। चरवाहे ने कहा-“आप सही कह रहे हैं। हमारे पास भी दो कान, दो नथुने, दो आंखें, दो हाथ, दो पैर, दो फेफड़े, दो किडनी खुदा ने दे रखी है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सभी में से एक एक कम कर दिया जाय तो आदमी को इनके अतिरिक्त भार वहन से मुक्ति मिलेगी और हर आदमी अपने को सहज भी महसूस करेगा।” यहूदी आलिम निरुत्तर हो गये।
चरवाहों की जिंदगी हमने बिल्कुल नजदीक से देखी है। हमारे सहपाठी को चरवाहा बनने की सूझी। पढ़ाई लिखाई छोड़ उन्होंने भैंस चराने की सोची। उन्होंने यह बात अपनी माँ को बताई। मां ने पिता को बताई। पिता राजी हो गये। उनका कहना था कि घर में कोई ऐसा भी होना चाहिए। सब पढ़ लिख नौकरी करेंगे तो खेती कौन करेगा? जब उनको हरी झण्डी मिल गयी तो मेरे मन में भी चाह जगी-भैंस चराने की। मैंने माँ से कहा कि मैं भी भैंस चराऊंगा। मेरे लिए एक भैंस खरीद दो। मां परेशान हो गयी। बोली-पहले भैंस चराना तो सीख लो। सीख लेने के बाद मैं भैंस खरीद दूंगी। हम दोनों बिला नागा रोज सबेरे भैंस चराने जाने लगे। भैंस की पीठ पर बैठते। कुछ इधर उधर जातीं तो लाठी से उन्हें सहेज देते।
भैंस ज्यादा देर तक धूप में नहीं रहतीं। भैंस का रंग काला होता है। काला रंग गर्मी को जल्द अवशोषित करता है। गर्मी को अवशोषित करने की वजह से भैंस जल्दी घर भाग जाती है। वह गर्मी से परेशान हो गड़हे में घुस जाती। कीचड़ व पानी में लोटने लगती। कुछ देर बाद वह घर आ जाती। उसके बाद से हमें कुछ नहीं करना पड़ता। हम आराम करते। साथियों के साथ गिल्ली डंडा खेलते। खाना खाते। मटरगश्ती करते और सो जाते। नेहरू जी ने कभी नारा दिया था- आराम हराम है। हमारा आराम भी हराम हो गया। भैंस की चरवाही से हमें बेदखल कर दिया गया। हमें स्कूल भेज दिया गया। चन्द्रशेखर पंडी जी ने पहले हमारे सहपाठी की मरम्मत की-भइंस चरइबअ (भैंस चराओगे?)। मुझे मारा-भइंस चरावे के टरेनिंग लेबअ (भैंस चराने की ट्रेनिंग लोगे?)।
इन चरवाहों का जीवन गजब का होता है। कभी कभार ये चरवाही में आकर मुंह ढंककर सो जाते। चरवाहे का सोना चरने वाले पशु को आह्लादित कर देता है। वे आराम से फसल वाली खेत में घुसकर दावत उड़ाते हैं। यदि खेतवाह ने देख लिया तो वह चरवाहे की माँ बहन एक कर देता। यदि चरवाहे की पहले नींद खुल जाती तो वह खेत से उन्हें निकाल लाता और मां बहन की गाली खाने से बच जाता। पहाड़ों में कभी कभार ये चरवाहे बघेरा के ग्रास भी बनते देखे गये हैं। मेरे गांव में मोती लाल नाम के चरवाहे की गायें घर आ गयीं, पर मोती लाल नहीं आया। रात को गांव वाले लाठी और टार्च लेकर उसे ढूंढने गये। पानी में उसकी लाश तैर रही थी। गांव वाले लाश ले आए। उस दिन हम रात भर नहीं सो पाए। दूसरे दिन दरोगा आए। लाश का पंचनामा कराया गया। मौत किन कारणों से हुई यह रहस्य बरकरार रहा। अधिकत्तर लोगों का मानना था कि बूड़ा (पानी का एक भूत) ने धर डुबोया होगा।
चरवाहों को गायों पर बहुत नियंत्रण होता है। उनके एक एक्शन से गाएं एक जगह पर आ खड़ी होती हैं। फिर चरवाहे के एक इशारे पर घर की तरफ चल देती हैं। उनकी चलने से जो धूल उड़ती है, उसे गोधूलि कहते हैं। कुछ लोग शाम को ही गोधूलि बेला कहते हैं। जब हम चरवाही सीख रहे थे तो उस समय एक छोटी लड़की भी आती थी। वह बहुत बढ़िया गाती थी। चरवाह उसके लिए लाठी की पालकी बनाते। उस पालकी पर बैठ वह रोती भी और गाती भी। वह अपने ससुराल जाने का स्वांग करत। सब मिलकर उसकी पालकी को कंधा देते। एक दिन उसकी सचमुच में शादी हो गयी। वह अपने ससुराल चली गयी।
बहुत दिनों बाद पता चला कि उस लड़की की मृत्यु हो गयी है। उसके ऊपर खौलते हुए पानी का बर्तन गिर गया था। वह 75% जल गयी थी। उसे थाने पर रखा गया था। पूरा शरीर ढका हुआ था। केवल मुंह बाहर था। मुझे देख उसकी आंखें भर आईं। हास्पिटल में इलाज के दौरान वह चल बसी। आज भी उस परती के आबाद खेत को देखता हूँ तो मुझे उस लड़की की आवाज सुनाई देती है-
अठवा के माई, कठवा के बाबूजी!
कमरी ओढ़ाई बिदा कईलअ हो बाबूजी!

ई. एस. डी. ओझा

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