पुअवा जे पाकेला कराही में…

मेरा बचपन गांव और हाबड़ा (पश्चिम बंगाल) में अधिकत्तर बीता है। हाबड़ा में एक जगह है बी गार्डेन, जहाँ की धरती पर हम खेले कूदे और लोटे हैं। बचपन से हीं मैं पुआ का शौकीन रहा हूँ। मैं अक्सर जिद कर पुआ बनवाता था। हमारी एक किरायेदारिन थी। उसकी बेटी का नाम मोन्हिया था। इसलिए सब उसे मोन्हिया के माई कहते थे। मोन्हिया के माई अक्सर मुझे पुआ की याद दिलाती रहती थी। पुआ याद आने पर मैं घर की तरफ भागता। मां जल्दी के लिए तवा पर पकाने के लिए उद्दत होती तो मैं उसके सामने कराही और छनवटा रख देता। मतलब पुआ बनेगा तो कराही में अन्यथा नहीं।
जब पुआ खा लेता तो एक धोकरकस घूंघट काढ़े एक बड़ा सा थैला लेकर आता। कुछ नक्की स्वर में कहता-बेटे को इसी थैले में डाल दीजिए। मां डालती, लेकिन मैं उछलकर उस थैले से दूर चला जाता। ऐसा एक दो बार ही हुआ। बाद में मुझे पता चल गया कि यह कोई धोकरकस नहीं बल्कि मोन्हिया की माई ही है। फिर मैं कभी नहीं डरा, लेकिन गाहे ब गाहे मेरी पुआ खाने की आदत पर अब विराम लग गया। अब भी पुआ खाता, पर माँ की मर्जी पर। फिर पुआ थोक के भाव बहन के घर खाने को मिला। मां और हम मामा के यहाँ गये थे। वहीं से मां ने बहन के घर खिचड़ी पर्व की सीरनी भिजवाई। सीरनी एक औरत लेकर गयी। सीरनी के साथ माँ ने मुझे भी भिजवाया बहन से मिलने के लिए।
कृपाल पुर से सोनवानी की दूरी लगभग दो फर्लांग होगी। हम गंज के रास्ते सोनवानी गये। रास्ते में मैं जब पिछड़ता तो वह औरत खड़ी हो जाती। मुझे दौड़ने के लिए कहती। मैं दौड़ता, लेकिन दौड़ने से मेरे पेट में दर्द होने लगता। उस औरत को उसी दिन लौटना था, इसलिए वह जल्दी मचा रही थी। दौड़ते हाॅफते हुए हम सोनवानी गांव में पहुँचे। सोनवानी पहुँच कर मैं बहन के जेठ का नाम भूल गया। मैं हर किसी को बताता कि मुझे रईछा मिश्र के यहाँ जाना है। एक कुंए की जगत पर कुछ लोग स्नान कर रहे थे। वहाँ भी हमने दरयाफ्त की। रईछा मिश्र को कोई नहीं जानता था। अचानक एक सज्जन बोल उठे-बबुआ! तुम्हें कहीं अन्नत मिश्र के यहाँ तो नहीं जाना है? मैं खुश हो गया। यही नाम था बहन के जेठ का। अन्नत चतुर्दशी के दिन हाथों में रक्षा सूत्र बांधते थे। इस रक्षा सूत्र को भोजपुरी में रईक्षा कहते हैं। इसलिए मैं अन्नत को रईक्षा कह रहा था।
उस दौर में मेरी उम्र केवल छः साल की थी। मैं उस औरत के साथ बहन के आंगन में पहुँचा। बहन की जेठानी ने कहा-अरे, ई केकर लईका ह ? (अरे, ये किसका लड़का है?)। तभी पीछे से आ मेरी बहन मुझे गोद में उठा ले गयी। बहन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए गांव की दूकान से बड़े वाले बतासे मंगवाए। पुआ बनाया। मैं छककर खाया। यहाँ किसी धोकरकस के आने का कोई डर नहीं था। सात दिन रहा और सात दिन हीं पुआ खाया। बाद में मेरी दो ममेरी बहनें आईं मुझे ले जाने के लिए। बहन ने मुझे भेजने से इंकार कर दिया। उन बहनों ने मुझे रोने के लिए कहा ताकि बहन मुझे भेज दे, लेकिन मैं कृतघ्न नहीं था। मैं नहीं रोया। जब वे चलीं गईं तो मुझे बहुत रोना आया। मुझे मां की बहुत याद आ रही थी। मैं बहन से छिपकर रोया था। बहन को बिल्कुल पता नहीं चला था।
दो दिन बाद मां से मेरी भेंट हुई थी। मां रात के अंधेरे में गंज पर मेरी उन्हीं ममेरी बहनों के साथ आई थी। मुझसे मिली। बहन से मिली। वह बिना मुझे लिए हीं चली गयी। मां को बड़े मामा का डर था। मामा नाराज होते मां के इस कदर रात के अंधेरे में बहन से मिलने पर। उस समय पर्दा प्रथा अपने सबाब पर था। मुझे याद है मां ने माचिस की तिल्ली जलाकर बहन व मुझे देखा था। हम मां से मिलकर लौट आए थे। मैं अब बड़ी शिद्दत से मां से मिलने के लिए तड़प उठा था। मुल्कराज आनंद की “द लाॅस्ट चाइल्ड ” की तरह मुझे केवल माँ का ख्याल आ रहा था। पुआ का आकर्षण खत्म हो गया था।
दो दिन के बाद उमाशंकर भइया (ममेरे) आए थे। बहन ने जल्दी से तवे पर पुआ पकाया था। अबकी बार मैंने छनवटा कराही बहन के आगे नहीं रखा। अब मुझमें सद्बुद्धि आ गयी थी। मुझे बहन की परेशानी का ख्याल आ गया था।

ई. एस. डी. ओझा

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