जयपुरी रजाइयां

बहुत पहले एक कहानी पढ़ी थी, जिसमें एक बेटा अपनी मां को जयपुरी रजाई आने वाली सर्दियों में दिलाने का वादा करता है, लेकिन दुर्योग से माँ सर्दियों से पहले गुजर जाती है। बेटा दुःखी हो जाता है। जयपुरी रजाई मिलने से मां को जो अवर्चनीय खुशी मिलती उसे देखने से बेटा बंचित रह गया। जब बात रजाईयों की आती है तो सबके जहन में सिर्फ जयपुरी रजाइयां ही आती हैं। 250 ग्राम रूई से बनी ये रजाई जयपुरी रजाईयों के नाम से दुनिया भर में प्रसिद्ध है। जयपुर आने वाला हर पर्यटक और मेहमान सर्दी के मौसम में जयपुर रजाई खरीद कर जरूर ले जाता है। यह एक छोटे से बैग में आ जाती है।
सवाईं जयसिंह ने जब जयपुर शहर बसाया तो उन्होंने भारत के कोने कोने से शिल्पियों को जयपुर में बसने के लिए बुलाया। ढेर सारे शिल्पी पहुँचे। इन्हीं में इलाही बख्श भी थे। इलाही बख्श को इस तरह की रजाई बनाने का इल्म था। उन्होंने सवाईं जयसिंह के लिए एक रजाई तैयार की, जो काफी हल्की, नर्म और निहायत ही गर्म थी। राजा जयसिंह को यह रजाई बेहद पसंद आई। जिस उत्पाद को राजा ने पसंद किया उसकी ख्याति बढ़नी ही थी। इलाही बख्श की यह रजाई लोग धड़ाधड़ खरीदने लगे। लोगों ने इस्तेमाल किया और इस रजाई के मुरीद हो गये।
भारत के कोने कोने में यह रजाई प्रसिद्ध हो गई। आज जयपुर में छः हजार कारीगर रोजाना पांच हजार रजाइयां बनाते हैं। ये रजाइयां सूती, रेशमी, मखमल के कपड़ों की बनी होती हैं। ये सिंगल, मीडियम व डबल बेड के लिए डिजाइन की जातीं हैं। इनकी हर मौसम में मांग रहती है। जो भी जयपुर आता है, वह इसे जरुर खरीदता है। मखमल की रजाइयां शादी/व्याह में देने के लिए होती हैं। अक्सर लोग इस मौके पर गहरे लाल रंग की रजाई खरीदते हैं, क्योंकि लाल रंग प्रणय का प्रतीक माना जाता है।
इन रजाइयों के रुप रंग और गुण के आगे कोई अन्य रजाई नहीं ठहरती। हाथ से किए गये बारीक काम की कोई शानी नहीं है। आकर्षक कढ़ाई और सितारों का काम इन रजाइयों को और रजाइयों से विशेष बनाता है। यही कारण है कि इन रजाइयों की मांग देश ही नहीं विदेशों में भी है। ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और डेनमार्क में इन रजाइयों की खपत काफी है।

ई. एस.डी. ओझा

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