शनिचरी

काम को ब्रह्मानंद का सहोदर कहा गया है। इसका एक नाम अनंग भी है। कुमार सम्भव में कालिदास ने लिखा है कि काम का दहन शिव के तीसरे नेत्र के खुलने पर हुआ था। काम की पत्नी रति के विलाप करने से शिव ने दया दिखाई और उसे जीवित कर दिया, पर उसका मूल स्वरुप फिर कभी नहीं लौटा। वह हर स्त्री पुरुष में विद्यमान रहने लगा। आज हर नर मादा के समागम पर काम व रति मिलते हैं। सृष्टि की रचना चलती है। शिव पुराण में काम को त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के समकक्ष रखा गया है। कामेच्छा की शुरुआत नर मादा से होती है और नर मादा पर ही खत्म भी होती है।
शनिचरी ने काम से धन उपार्जन किया था। इस धन से उसने गंगा तट स्थित बालेश्वर घाट पर 1950 में एक शिव मंदिर बनवाया था। चूँकि इसमें काम से उपार्जन किया हुआ धन लगा था, इसलिए इस देवाधिदेव शिव का नाम कामेश्वर नाथ रखा गया। कामेश्वर नाथ से ही ददरी मेला की शुरुआत होती है। ददरी मेले का आयोजन भृगु ऋषि के शिष्य दर्दर मुनि के नाम पर किया जाता है। शनिचरी बांसथाना गांव की एक निषाद महिला थी। यह गांव अब गंगा के कटान में विलीन हो गया है। गरीबी के कारण घर वालों ने उसे घर का काम करने के लिए बंधुआ मजदूर के तौर पर एक मारवाड़ी सज्जन के साथ कलकत्ता भेज दिया था। उस समय शनिचरी की उम्र 7/8 साल की रही होगी।
देश के बंटवारे के समय 1947 में अराजक तत्वों ने उन मारवाड़ी सज्जन के घर पर हमला बोल दिया। शनिचरी अब 20/22 साल की युवती बन चुकी थी। वह तलवार लेकर उन गुण्डों से अकेले ही भिड़ गयी। उसने चार गुण्डों का काम तमाम कर दिया। शेष अराजक भाग गये थे। शनिचरी ने अपने अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य से अपने मालिक की जान माल की सुरक्षा की थी। बाद के दिनों में यह मारवाड़ी परिवार कलकत्ता से मुम्बई शिफ्ट कर गया था। जाते—जाते इस परिवार ने शनिचरी को अपनी कलकत्ता वाली कोठी उपहार स्वरुप प्रदान कर दी थी। यह उनका शनिचरी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अद्भुत तरीका था।
बड़ा बाजार की इस कोठी की शनिचरी अब स्वामिनी बन गयी थी। उसने पश्चिम पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान से भागकर आई हुईं निराश्रित महिलाओं को अपनी इस कोठी में शरण देना शुरु किया। हर इंसान के लिए “रोटी, कपड़ा और मकान” की मूलभूत आवश्यकता होती है। निराश्रित महिलाओं के सिर पर छत का बन्दोबस्त तो हो गया, पर भोजन व कपड़े की व्यवस्था उन्हें स्वंय ही करनी थी। पेट की अगन शांत करने और तन को ढकने के लिए इन महिलाओं को देह व्यापार में शामिल होना पड़ा। अब यह कोठी कोठे में तब्दील हो गयी थी और शनिचरी इस कोठे की मालकिन बन गयी थी।
कामेश्वर नाथ के इस मंदिर में हर साल कार्तिक पूर्णिमा को (ददरी मेले के समय) शनिचरी यज्ञ करवाती थी।
उसने बलिया में तीन धर्मशाला और अनेकानेक कुएँ खुदवाए थे। यही नहीं उसने अयोध्या, मथुरा, वाराणसी, बद्रीनाथ, केदारनाथ व गया में भी बहुत से धर्मशालाएं बनवाईं थीं।
शनिचरी कलकत्ता से आने के बाद बलिया में ही बस गयी थी। वह सुबह तीन बजे उठ जाती थी। पूरे मंदिर की साफ सफाई करती थी। उसे धोती थी। फिर दो घंटे तक पूजा करती थी। फिर साधु संतों के साथ धर्म पर चर्चा करती थी। उनके साथ गांजा पीती थी। उसका अपना साफी था, जिसे वह किसी को भी छूने नहीं देती थी। इन्हीं दिनचर्याओं में रहते हुए एक दिन शनिचरी भी काल के गाल में समा गयी। वह अपने पीछे एक यही (कामेश्वर नाथ) मंदिर छोड़ गयी है, जो कामेश्वर नाथ की बजाय शनिचरी के मंदिर के नाम से ज्यादा विख्यात है। उसके बनाए गये धर्मशालाओं पर लोगों ने अब अवैध कब्जा कर रखा है। रही बात कुओं की तो वे या तो सूख गये हैं या भस गये हैं।
Shivkumar kaushikey से बातचीत व उनके द्वारा प्रदत्त लिखित जानकरी के आधार पर।

ई. एस. डी. ओझा

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