लाल इमली इतिहास बनने के कगार पर

कानपुर की शान लाल इमली को एक बीमार यूनिट घोषित किया जा चुका है। यह देश के 46 बीमार सरकारी उपक्रमों में शामिल है। इनमें से कुछ उपक्रमों को बंद करने और कुछ को निजी हाथों में देने का प्रस्ताव विचाराधीन है। लाल इमली मिल में उत्पादन दिसंबर 2013 से बंद है। इस मिल की स्थापना वर्ष 1876 में हुई थी। उस समय इस मिल का नाम “कानपोरे वुलन मिल्स” था। यह मिल ब्रिटिश सेना में भर्ती सिपाहियों के लिए कम्बल बनाने का काम करती थी। बाद में इस मिल का नाम “कानपोरे वुलन मिल्स” से बदलकर “लाल इमली” कर दिया गया। लाल इमली नाम रखने का एक रोचक प्रसंग है। दरअसल मिल के परिसर में एक लाल इमली का पेड़ था। इसलिए इस मिल का नाम “लाल इमली” रखा गया।
गुजरते वक्त में इस कम्पनी ने आम लोगों के लिए भी कम्बल, शॉल और ऊन बनाना शुरू किया। देखते ही देखते कड़ाके की सर्दी से दो-चार होने वाले उत्तर भारत में यह घरेलू नाम बन गया, क्योंकि “लाल इमली” अब एक बहुत बड़ा ब्राण्ड बन गया था।
यह मिल कानपुर शहर की आन बान थी। लाल इमली के ऊनी वस्त्रों की गुणवत्ता आले दर्जे की थी। यह 1920 में एक लिमिटेड कम्पनी के रुप में पंजीकृत की गयी थी। 11 जून 1981 को इस मिल का राष्ट्रीयकरण किया गया। फलतः यह सरकार के अधीन हो गयी। यहीं से इस मिल का पतन होना शुरु हो गया। वर्ष 1992 आते आते इसे एक बीमार यूनिट घोषित कर दिया गया। अब यह मिल बंद होने वाली है। लाल इमली मिल के कामगारों और अधिकारियों का तकरीबन दो साल से ऊपर का तनख्वाह बकाया है। कामगारों ने घर चलाने के लिए ठेले लगाने शुरु कर दिए हैं।
ज्ञातव्य है कि इस मिल में तीन शिफ्टों में दस हजार कर्मचारी काम करते थे। अब वर्ष 2013 से इसमें उत्पादन बंद है। कई बार कर्मचारियों ने अपने बकाये वेतन के लिए ढोल मजीरे के साथ थाली चम्मच बजाकर धरना प्रदर्शन भी किया है, लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई है।

ई. एस. डी. ओझा

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