उगना रे मोर कतय गेलाह…

मैथिली भाषा के एक बहुत बड़े कवि हुए हैं-विद्यापति। विद्यापति शिव के अनन्य भक्त थे। कहा जाता है कि स्वयं शिव विद्यापति की भक्ति से खुश थे और वे भी विद्यापति के साथ रहना चाहते थे। अतः शिव ने नौकर का रूप धारण किया और विद्यापति के साथ रहने लगे। नाम रखा-उगना।
एक दिन विद्यापति व उगना जंगल के रास्ते जा रहे थे। विद्यापति को प्यास लगी। उगना (भगवान शिव) ने वहाँ से कुछ दूरी पर जाकर, अपनी जटा खोला, लोटे में गँगा जल भरा और आकर विद्यपति को दिया। विद्यापति को पानी का स्वाद गंगाजल जैसा लगा। उन्हें आश्चर्य हुआ कि यहाँ गँगा जल कहाँ से आया? विद्यापति उगना के पीछे पड़ गए। बताइये आप कौन हैं? अब भगवान शिव को अपने असली रूप में आना पड़ा। शिव ने कहा-जिस प्रकार आप मेरे भक्त हो, उसी प्रकार मुझे भी आपका साथ पसन्द है। इसीलिए मैं उगना बन आपके साथ रहने आ गया था। यदि आप इस घटना का जिक्र अन्यत्र करोगे तो मैं आपको छोड़कर चला जाऊँगा।
घर आकर विद्यापति ने इस घटना का जिक्र किसी से नहीं किया। शिव भी विद्यापति के साथ ही रहे। एक दिन विद्यापति कहीं बाहर से आए तो देखते हैं कि किसी छोटी सी गलती के लिए उनकी पत्नी उगना को झाड़ू से पीट रही है। भावावेश में विद्यापति चिल्ला उठे-तुम साक्षात् शिव की पिटाई कर रही हो। इस बात को सुनकर विद्यापति की पत्नी सकते में आ गईं। उन्होंने भगवान शिव से माफ़ी मांगीं।
चूँकि भगवान शिव ने विद्यापति से कहा था कि जिस दिन मेरी पहचान जगजाहिर हो जायेगी उस दिन मैं आपको छोड़ कर चला जाऊँगा, इसलिए शिव विद्यापति को छोड़कर चले गए। विद्यापति हैरान, परेशान हो कहते ही रह गए…
“उगना रे! मोरा कतय गेलाह”…

ई. एस. डी. ओझा

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