झूठ बोले कौवा काटे

“झूठ बोले कौवा काटे” वाली कहावत श्री राजकपूर की देन है। फिल्म बाॅबी में ही इस कहावत का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया, लेकिन लोग इस शिद्दत से इसका उपयोग करते हैं कि लगता है कि यह कहावत बहुते पुरानी है। वैसे यह कहावत न होकर एक जुमला है, जिसे राजकपूर ने किसी अभिनेत्री को फोन करते समय उछाला था। अभिनेत्री घुटी हुई थी। उसने दीन दुनिया देखी थी। वह इस उछाल के नीचे दबी नहीं। वह अपने को बचा ले गयी। यही कारण था कि यह जुमला फिल्म बाॅबी का एक गीत बना और खूबे मकबूल रहा था।
राजकपूर कोई गीतकार नहीं थे इसलिए उन्होंने इस गीत में एक भयंकर गल्ती कर दी। कौवे को आज तक किसी ने काटते हुए नहीं देखा था। वह काटता नहीं, चोंच मारता है। चोंच तभी मारता है, जब कोई उसके घोंसले से छेड़छाड़ करता है या अण्डे या बच्चों के साथ कोई नाइंसाफी करता है। झूठ बोलने पर तो कत्तई नहीं। यहां तो लोग दिन भर में पता नहीं कितनी बार झूठ बोलते हैं। कौवा किसी को मारना तो दूर एक हर्फ भी नहीं कहता। कहेगा भी कैसे? वह चोंच किस—किस को मारेगा? इतने झूठे लोगों को सजा देने के लिए कौवों की एक टीम बनानी पड़ेगी। दूरभाष का इंतजाम करना पड़ेगा।
दूरभाष से सूचना दी जाएगी-दिल्ली के चांदनी चौक में अभी—अभी 100 लोगों ने झूठ बोला है, उन्हें चोंच मारने के कौवों की एक प्लाटून शीघ्र भेजो। इसमें ह्वाट्सप फेसबुक की सेवाएँ भी अपरिहार्य रुप से लेना होता, किंतु कौवे की रुचि इस तरह के कामों में जरा सा भी नहीं है। वह इंसानों द्वारा प्रदत्त श्राद्ध के दिनों के प्रीति भोज से इतना संतुष्ट हो जाता है कि वह इंसानों को चोंच मारने से पहले सौ बार सोचेगा। इंसान भी जब कौवों के झुण्ड को पिण्ड दान खाते हुए देखता है तो वह खुशी से उछल पड़ता है कि उसके पूर्वजों ने उनका दिया खाना जिम लिया। ऐसे में इंसानों और कौवों का वैमनस्य पनप ही नहीं सकता।
झूठ पकड़ने का काम राजहंस का होता है। उसे नीर क्षीर विवेकी भी कहा जाता है। वह दूध का दूध और पानी का पानी करता है। वह यह जान लेता है कि कौन सच्चा है और कौन झूठा। शायद राजहंस ने ही बताया था कि दिल सच्चा और चेहरा झूठा होता है। इसीलिए फिल्म सच्चा—झूठा में राजेश खन्ना कूद—कूदकर नाच गाकर कहते हैं-दिल सच्चा और चेहरा झूठा, चेहरे ने लाखों को लूटा। लेकिन सजा देने का महकमा राजहंस के पास भी नहीं है। वह सच—झूठ की केवल इत्तिला भर देता है। सजा देना या न देना इंसानों पर मुनस्सर करता है। कौवे को खामखा राजकपूर साहब ने इस पचड़े में फंसवा दिया। कौवा एक निरीह प्राणी है, उसे निरीह ही रहने दिया जाये। उसे इंसानी मसलों से दूर ही रखा जाय।
ई. एस. डी. ओझा

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