फिर नया साल

हर साल नए साल की आहट के साथ ऐसा हंगामा खड़ा होता है कि लगने लगता है, आने वाला साल कुछ खास होने वाला है। पिछले साल से कुछ बेहतर, कुछ सुंदर, कुछ ज्यादा मानवीय। दरअसल होता-वोता कुछ नहीं। इस साल भी नया कुछ नहीं होने वाला है। सब वही रहेगा-वही समाज, वही रहनुमा, वही सियासत, वही महंगाई, वही सांप्रदायिकता, वही हिन्दू-मुस्लिम, वही हिंदुस्तान-पाकिस्तान। हां, इस बेमतलब के हंगामे में असंख्य मुर्गे और बकरे ज़रूर कटेंगे। शराब और ड्रग्स की खपत में बेतहाशा इज़ाफ़ा होगा। क्लबों और होटलों में नंगी और अधनंगी लड़कियां नचाई जाएंगी। सड़कों पर बवाल कटेगा। नए साल में अगर नया कुछ होना है तो वह हमारे भीतर ही होगा। तो इस साल बदलाव की शुरुआत क्यों न हम ख़ुद से ही करें ? कोशिश करें कि हमारे आसपास की दुनिया थोड़ी मुलायम, थोड़ी खूबसूरत बनें! राजनीति को ख़ुद पर ऐसा हावी न होने दें कि वह हमारी वैचारिक स्वतंत्रता छीन ले या हमारी उदार सामाजिक संरचना ही तोड़ डाले। राजनेता तो आते-जाते रहेंगे, जीवन भर हम सबको साथ रहना है। हम आपसी प्यार‌ और समझ बढ़ाने की कोशिशें करें। सड़कों पर मानसिक दरिद्रता के प्रदर्शन के बज़ाय अपने आसपास की थोड़ी साफ-सफाई कर लें। कुछ पेड़-पौधे लगाएं! अपनी नदियों, तालाबों को साफ़ रखने का संकल्प लें। कुछ खाए-अघाए लोगों के साथ मस्ती करने की जगह कुछ खुशियां उनके साथ बांटे जिन्हें उनकी वाक़ई ज़रुरत है। थोड़ी मुस्कान उन होंठों पर धरें जो मुस्काना भूल गए हैं। जो रूठे हैं, उन्हें मना लें। तमाम मुश्किलों के बावज़ूद हमारी दुनिया अब भी खूबसूरत है। इसे महसूस करने के लिए किसी नशे या उत्तेजना की नहीं, थोड़ी संवेदनशीलता की ज़रुरत है!
ध्रुव गुप्त

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