गर्भ के दौरान जब अखाद्य चीजें खाने का मन करे

मातृत्व प्रकृति की एक नैसर्गिक देन है। मां बनकर ही औरत सम्पूर्ण औरत बनती है। पेट में बच्चे की हलचल को महसूस करना माँ को एक अलग दुनिया में ले जाता है। इस दुनिया में आ जाने पर बच्चे की मुलायम अंगुलियों की छुअन से माँ रोमांचित हो जाती है। बच्चे का चुटुर चुटुर दूध पीने का अंदाज और लात फेंकना माँ को आनंद से परिपूर्ण कर देता है। मातृत्व के शुरुआती दौर के गर्भावस्था में माँ को खट्टा खाने का ज्यादा मन करता है, किंतु कई बार ऐसी अखाद्य चीजों को भी खाने का मन करता है, जिसके बारे में आप सोच भी नहीं सकते।
कभी टूथपेस्ट तो कभी कोयला खाने के लिए मन ललचाता है। कई बार मिट्टी, सिगरेट की राख, पेन्ट, बेकिंग सोडा, डिटरजेन्ट पाउडर आदि भी खाने का मन करता है। जानकारों का कहना है कि आयरन, कैल्शियम और अन्य पोषक तत्वों के अभाव में अक्सर अखाद्य चीजों को खाने की इच्छा मन में जागृत होती है। ऐसी इच्छा होने पर औरतों को अपने मन पर नियंत्रण करना चाहिए। मन को किसी रचनात्मक कार्य में उलझाना चाहिए। च्यूइंग गम, तुलसी के पत्ते या पुदीने के पत्तों को खाना चाहिए। चूरन चटनी अचार का सेवन करना चाहिए।
अखाद्य चीजों से छुटकारा पाने के लिए डाक्टर से भी सलाह लेना चाहिए। डाक्टर खून की जांच से पता लगा लेगा कि किस किस पोषक तत्व की शरीर के अंदर कमी है। उन पोषक तत्वों की कमी दूर करने के लिए डाक्टर विटामिन्स और मिनर्ल्स के कैप्सूल देते है, जिससे शरीर में ये कमियां दूर हो जाएंगी और अखाद्य खाने का मन कभी नहीं करेगा। अखाद्य चीजों का यदि सेवन कर लिया जाए तो यह जच्चा व बच्चा के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं।
अखाद्य चीजों को खाने की प्रक्रिया को “पीका” कहा जाता है। यह शब्द लैटीन शब्दावली से लिया गया है। दरअसल मैगपी नाम की चिड़िया लगभग सबकुछ ही खाती है। इसलिए मैगपी का अंतिम अक्षर “पी” के साथ “का” की जोड़ी बनाकर इसे पीका बना दिया गया है। ऐसा नहीं है कि ये समस्या सिर्फ गर्भवती महिलाओं को ही होती है। छोटे बच्चों में भी यह समस्या होती है। ऐसे बच्चों पर हरदम निगरानी रखनी चाहिए। उन्हें अखाद्य चीजों से दूर रखना चाहिए और साथ ही उसे को बाल रोग विशेषज्ञ से भी जरुर दिखाना चाहिए।

ई. एस. डी. ओझा

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