बदहाल मिर्ज़ापुर का किला चुनार

56 साल ईसा पूर्व उज्जैन के शासक विक्रमादित्य ने अपने बैरागी बड़े भाई भर्तृहरि के लिए यह एकांत तपस्थली बनवाई थी। इस किले में आज भी भर्तृहरि की समाधि मौजूद है। यहाँ एक गुफ़ा है जो भर्तृहरि की गुफा के नाम से मशहूर है। पहले इस किले का नाम चरणादृगढ़ था, जो कालांतर में अपभ्रंशित हो चुनार हो गया।
18 अप्रैल सन् 1924 को चुनार के किले में एक शिलालेख उत्कृण किया गया, जो यह दर्शाता है कि इस किले पर किन—किन लोगों का अधिपत्य रहा। इस किले की वजह से गंगा को अपना मार्ग बदलना पड़ा है। शायद गंगा भी भर्तृहरि के तप से भयभीत थी इसीलिए इसने अपना मार्ग बदल लिया। बाद में इस किले पर आल्हा उदल का अधिपत्य हो गया। चुनार के किले में ही आल्हा का विवाह सोनवा से हुआ था। अब भी इस किले में सोनवा मण्डप विद्मामान है।
विक्रमादित्य व आल्हा उदल के बाद इस किले पर पृथ्वी राज चौहान, शाहबुद्दीन गौरी, बाबर, शेरशाह सूरी, हुमायूँ आदि का अधिपत्य रहा। अबुल फजल द्वारा रचित आईना-ए-अकबरी में भी इसका जिक्र है। अंग्रेजों के जमाने में यहाँ असलहे रखे जाते थे। वारेन हेस्टिंग्स जब कभी पूर्वांचल दौरे पर निकलते थेे तो चुनार के किले में रात्रि-विश्राम जरूर करते। कालांतर में अंग्रेजों ने यहाँ कैदियों को रखना शुरू किया। इसके छोटे से इलाके को अंगरेजों द्वारा कब्रगाह के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था।
आजकल चुनार के किले में पुलिस प्रशिक्षण केंद्र खुला हुआ है इसलिए आम जनता व पर्यटक इसके अंदर नहीं जा सकते। मेरा यह कहना है कि पुलिस प्रशिक्षण केंद्र कहीं अन्यत्र खोला जाय और चुनार के किले को सब के लिए खोल दिया जाय ताकि पर्यटन का विकास के साथ साथ सभी को इस किले के बारे में वांछित जानकारी हासिल हो सके।
बड़े दुःख का विषय है कि यह किला अपनी रंगत खो रहा है। दीवारों में दरारें पैदा हो रही हैं। इसके बुर्ज़ के पत्थर अब हिलने लगे हैं। काल के निर्मम थपेड़े इस किले को अब जर्जर कर रहे हैं। पर्यटन का ढिंढोरा पीटने वाली यह भारत सरकार कब इस किले की सुध लेगी? कहा नहीं जा सकता। ऐतिहासिक महत्व के इस चुनार किले की मरम्मत एवं अनुरक्षण अति आवश्यक है अन्यथा राजा भर्तृहरि के समय के इस किले का विध्वंस हो जायेगा!

ई.एस. डी. ओझा

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