जब औरत के जीवन में कोई दूसरा आ जाए

समाचार पत्रों में अक्सर खबरें छपती रहतीं हैं दो बच्चों की मां एक युवक के साथ फरार। ऐसा कई कारणों से होता है। बहुधा इस तरह के मामलों में जिस्मानी ताल्लुक हाॅवी रहता है। कलकत्ता में हमारे पड़ोस में एक औरत अपने बच्चों के साथ किसी नशेड़ी युवक के साथ भाग गयी। बात जब जिस्म से पेट पर आई तो आटे—दाल का भाव मालूम हुआ और उस औरत को अपने पति के पास लौटना पड़ा। फिल्म “दूसरा आदमी” में एक उम्रदराज औरत एक युवक के प्यार में पड़ जाती है। उस औरत के पूर्व प्रेमी (जो अब इस दुनिया में नहीं है) की शक्ल उस युवक से मिलती है। यही आधार है दोनों के बीच के प्यार का। दोनों एक दूसरे को डेट करने लगते हैं। डेट करने पर पता चलता है कि दोनों का मानसिक स्तर मेल नहीं खाता। ऐसे में युवक कहता रह जाता है “चल, कहीं दूर निकल जाएँ” और औरत सोच लेती है “अच्छा है, सम्भल जाएँ।” औरत सम्भल जाती है। वह अपने एक हमउम्र दोस्त का हाथ पकड़ लेती है।
1985 में एक फिल्म आई थी-परमा। इसमें एक औरत अपनी दमित इच्छाओं की पूर्ति अपने से कम उम्र के एक युवक से करती है। यूएस से राहुल आया है भारतीय फिल्मों पर एक फीचर फिल्म बनाने। वह नायिका को केन्द्र में रखकर इस फिल्म को बनाना चाहता है। राहुल नायिका परमा की तस्वीरें खींचने की अनुमति मांगता है। नायिका राहुल के सामने अपने को असहज पाती है, जबकि राहुल का कहना है कि नायिका स्वाभाविक रूप से अपना काम करती रहे। वह तस्वीरें लेता रहेगा। अंत में राहुल के सामने नायिका समर्पण कर देती है। फीचर फिल्म बनने लगती है। साथ ही दोनों के बीच भी कुछ पनपने लगता है। फिल्म बनने के बाद राहुल भारत से चला जाता है। जाने के बाद भी वह परमा को चिट्ठियां लिखा करता है। एक चिट्ठी में वह परमा की वह तस्वीर भेज देता है जो अपारम्परिक ड्रेस में है। तस्वीर परमा के पति के हाथ लग जाती है। हंगामा मच जाता है। वह पति, सास सभी के नजरों से गिर जाती है। उसकी पेट जायी बच्ची भी पग—पग पर उसका अपमान करती है।
कई बार रसूखदार घरों की बहुएं, पत्नियां भी इन तथाकथित दूसरे के चक्कर में आ जातीं हैं। वे ड्राइवर, खानसामों, माली या अन्य घरेलू नौकरों के चक्कर में पड़कर अप्रत्याशित कदम उठा लेतीं हैं। ऐसे में रसूखदार लोग पहले तो बात ढकने की कोशिश करते हैं। बात आगे न बढ़े इसलिए उस मातहत की छुट्टी कर देते हैं। इसके बावजूद बात नहीं बनती है तो आनर किलिंग तक बात पहुँच जाती है। अक्सर दोनों का कत्ल कर दिया जाता है। कभी केवल प्रेमी की ही हत्या कर दी जाती है। ऐसी हालत में प्रेमिका ताजिंदगी अभिशप्त जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो जाती है। उसके साथ एक हरजाई विशेषण जुड़ जाता है। हत्या के बाद रसूखदार लोग भी सुखी नहीं रह पाते। वे कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने के लिए जीवित रहते हैं। तमाम परेशानियों से उनका साबका होता रहता है। वे भी जीते मर जाते हैं। बाज दफा प्रेमी ही प्रेमिका के घर वालों का कत्ल कर देता है। ऐसे में प्रेमी को कत्ल के जुर्म में सजा भुगतनी पड़ती है। प्रेमिका खून के आंसू रोती है। यदि प्रेमी के संग प्रेमिका भी मिली हो तो वह भी जेल में चक्की पीसती है।
मेरा मंतव्य यह है कि ऐसे मामलों में दोनों को ऊंच नीच समझाने की जरुरत है। दोनों परिवारों के इज्जत का हवाला देकर राह पर लाने का प्रयास करना चाहिए। यदि बात फिर भी न बने तो फिर अब कुछ भी करने की जरुरत नहीं है। आप छोड़ दीजिए दोनों को। साइड होकर तमाशा देखिए। एक कहावत है-घर छाय देखा, घर छाप देखा नहीं तो घर फूंक देखा। दोनों बालिग हैं। दोनों अपना भला बुरा समझते हैं। उन्हें अपना निर्णय लेने दीजिए। बच्चे तो है नहीं। महान चिंतक रुसो तो बच्चों के लिए भी मना करने के लिए नहीं कहता। वह कहता है-अगर बच्चा दीपक छूना चाहता है, उसे छूने दो। हाथ जलेगा तो फिर कभी दीपक नहीं छुएगा। यह तो हुआ तस्वीर का एक पहलू। दूसरा पहलू यह है कि उनको मनमर्जी करने देने से यदि एक दूसरे को मिस्टर व मिसेज राइट मिल जाएँ तो फिर हम दाल भात में मूसलचंद क्यों बनें?

ईत्र एस. डी. ओझा

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