ये जिंदगी है कौम की…

‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’ के उद्घोषक, अंग्रेजी शासन के खिलाफ गठित आज़ाद हिन्द फ़ौज के संस्थापक और सर्वोच्च कमांडर, देश को ‘जय हिन्द’ का नारा देने वाले भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने सीमित साधनों से जिस तरह ताक़तवर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मुकाबला किया, वह विश्व इतिहास की कुछ दुर्लभ घटनाओं में एक थी। आजाद हिन्द फौज को छोड़ विश्व-इतिहास में ऐसा कोई दृष्टांत नहीं मिलता जहां मात्र कुछ हजार युद्धबन्दियों ने संगठित होकर अपने देश की आजादी के लिए ऐसा प्रबल संघर्ष किया हो। भले ही वे देश की आज़ादी की जंग न जीत पाए, लेकिन वे एक हारे हुए युद्ध के ऐसे विजयी सेनापति थे जिन्होंने देश के युवाओं को उत्प्रेरित करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। आज उनकी जयंती (23 जनवरी) पर उनके जज़्बे, त्याग, बलिदान को शत-शत नमन, स्वतंत्रता-संग्राम के गायक गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ की कविता की कुछ पंक्तियों के साथ :

तूफ़ान जुल्म-ओ-जब्र का सिर से गुज़र लिया
की शक्ति-भक्ति और अमरता का वर लिया
ख़ादिम लिया, न साथ कोई हमसफ़र लिया
परवा न की किसी की, हथेली पे सिर लिया
आया न फिर क़फस में चमन से निकल गया
दिल में वतन बसा के वतन से निकल गया!

ध्रुव गुप्त

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