हम बयाबां में हैं और घर में बहार आई है

भारतीय साहित्य के हज़ारों साल के इतिहास में कुछ ही लोग हैं जो अपने विद्रोही स्वर, अनुभूतियों की अतल गहराईयों और सोच की असीम ऊंचाईयों के साथ भीड़ से अलग दिखते हैं। निर्विवाद रूप से मिर्ज़ा ग़ालिब उनमें से एक हैं। मनुष्यता की तलाश, शाश्वत तृष्णा, मासूम गुस्ताखियों और विलक्षण अनुभूतियों के इस अनोखे शायर के अनुभव और सौंदर्यबोध से गुज़रना एक दुर्लभ अनुभव है। लफ़्ज़ों में अनुभूतियों की परतें…

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शनिचरी

काम को ब्रह्मानंद का सहोदर कहा गया है। इसका एक नाम अनंग भी है। कुमार सम्भव में कालिदास ने लिखा है कि काम का दहन शिव के तीसरे नेत्र के खुलने पर हुआ था। काम की पत्नी रति के विलाप करने से शिव ने दया दिखाई और उसे जीवित कर दिया, पर उसका मूल स्वरुप फिर कभी नहीं लौटा। वह हर स्त्री पुरुष में विद्यमान रहने लगा। आज हर नर…

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जयपुरी रजाइयां

बहुत पहले एक कहानी पढ़ी थी, जिसमें एक बेटा अपनी मां को जयपुरी रजाई आने वाली सर्दियों में दिलाने का वादा करता है, लेकिन दुर्योग से माँ सर्दियों से पहले गुजर जाती है। बेटा दुःखी हो जाता है। जयपुरी रजाई मिलने से मां को जो अवर्चनीय खुशी मिलती उसे देखने से बेटा बंचित रह गया। जब बात रजाईयों की आती है तो सबके जहन में सिर्फ जयपुरी रजाइयां ही आती…

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सैर के वास्ते थोड़ी सी जगह और सही

दिल्ली के निज़ामुद्दीन में मौज़ूद मिर्ज़ा ग़ालिब की मज़ार दिल्ली की मेरी सबसे प्रिय जगह है। वहां की बेशुमार भीड़भाड़ में जब भी अकेला महसूस करता हूं, यह मज़ार मेरा सबसे भरोसेमंद साथी होता है। यह मज़ार संगमरमर के पत्थरों का बना एक छोटा-सा घेरा नहीं, भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बड़े शायर का स्मारक है। एक ऐसा स्मारक जिसमें उस दौर की तहज़ीब और उस दौर से आगे सोचने और…

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कश्मीर की धरती पर लाल कालीन

चिनार के पत्ते हथेली की तरह होते हैं। इसमें आप अंगुलियां भी देख सकते हैं। जब सर्दी की शुरुआत होने लगती है तो चिनार के पत्तों का रंग लाल हो जाता है। ये पत्ते झड़कर जमीन पर कालीन का भान कराते हैं। लगता है कि दूर दूर तक बंगाल का सोना बिखर गया है।ज्ञातव्य हो कि बंगाली सोना कुछ ललछौंहा रंग का होता है। चिनार मूल रूप से ईरान का…

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एक विरोध ऐसा भी!

ज़रूरी नहीं कि किसी मुद्दे पर विरोध दर्ज कराने के लिए कानून को धत्ता बताकर पथराव और आगजनी का ही सहारा लिया जाय। अपना प्रतिरोध दर्ज़ कराने के बहुत सारे खूबसूरत और ज्यादा कारगर तरीके भी हैं। ऐसा ही एक तरीका परसो आई.आई.एम, बेंगलुरू में देखने को मिला। वहां के अध्यापक और छात्र नागरिकता संशोधन कानून और एन.आर.सी के विरोध में एकत्र थे। पुलिस उनके सामने थी। पुलिस ने उन्हें…

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इस भरी दुनिया में कोई भी…

खुर्शीद जहां मुम्बई 1941 में अपने बहन से मिलने गयीं थीं। उस समय उनकी उम्र मात्र 20 साल की थी। उनके जीजा उन्हें फिल्म “सिकंदर” की मुहूर्त पर ले गये थे। फिल्म के प्रोड्यूसर सोहराब मोदी की पारखी नजर को खुर्शीद जहां में अभिनय की अपार सम्भावनाएं दिखाई दीं थीं। उन्होंने ट्रायल के तौर पर खुर्शीद जहां को उस फिल्म में एक रोल दे दिया। वह रोल तक्षशिला नरेश की…

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खाने की आजादी…

28 नवम्बर की रात को हमने चण्डीगढ़ से पाटलिपुत्र एक्सप्रेश पकड़ी। श्रीमती जी के भतीजे की शादी थी। नौकरी के दौरान मैं अपने ससुराल की अधिकतर शादियों में शरीक नहीं हो पाया था। फौज की नौकरी में तो छुट्टियों का बड़ा ही टांटा लगा रहता था। चूंकि यह अंतिम शादी थी और दैवयोग से मैं रिटायर्ड हो गया था। इसलिए छुट्टी का रोना अब नहीं रह गया था। रिटायर्ड लोगों…

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रंगवा में भंगवा परल हो बटोहिया

लोकभाषा भोजपुरी की साहित्य-संपदा की जब चर्चा होती है तो सबसे पहले जो नाम सामने आता है, वह है स्व भिखारी ठाकुर का। वे भोजपुरी साहित्य के ऐसे शिखर हैं जिसे न उनके पहले किसी ने छुआ था और न उनके बाद कोई उसके आसपास भी पहुंच सका। भोजपुरिया जनता की जमीन, उसकी सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं, उसकी आशा-आकांक्षाओं तथा राग-विराग की जैसी समझ भिखारी ठाकुर को थी, वैसी किसी…

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काफिरिस्तान के काफिर….

काफिरिस्तान का नाम सुने हैं? पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर एक छोटा सा इलाका है यह। बड़ा ही महत्वपूर्ण क्षेत्र! जानते हैं क्यों? क्योंकि आज से सवा सौ वर्ष पूर्व तक वहाँ विश्व की सबसे प्राचीन परंपरा को मानने वाले लोग बसते थे। रुकिए! हिन्दू ही थे वे, पर हमसे थोड़े अलग थे। विशुद्ध वैदिक परम्पराओं को मानने वाले हिन्दू… सूर्य, इंद्र, वरुण आदि प्राकृतिक शक्तियों को पूजने वाले…

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