अनचाहे उगती हैं बेटियाँ…

December 13, 2019

मेरी प्रिय कवयत्रियों में से एक रूपम मिश्र जी ने लिखा है, “बेटों की चाह में अनचाहे उग आती हैं बेटियाँ…” क्या सचमुच? शहरों के झूठ से पीछा छुड़ा कर गाँव को निहारने पर दिखता है, इस प्रश्न के उत्तर में ‘हाँ’ का प्रतिशत ‘नहीं’ से बहुत अधिक है। पर तनिक सोचिये न! बेटियाँ न हों तो जीवन में क्या बचेगा? बाहर की दुनिया से रोज पराजित हो कर थका-हारा…

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